18.2

संस्कृत

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥

kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhus tyāgaṃ vicakṣaṇāḥ

अनुवाद

भगवान ने कहा: कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ देने को ज्ञानीजन संन्यास जानते हैं, और सभी कर्मों के फल को छोड़ देने को विवेकी जन त्याग कहते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कृष्ण का उत्तर देखने में जितना सरल है, उतना है नहीं, और आगे आने वाली हर बात की नींव यही रखता है: संन्यास का अर्थ है कामना से प्रेरित कर्म (काम्य कर्म) को ही छोड़ देना, जबकि त्याग का अर्थ है केवल कर्म के फल को छोड़ना, कर्म को नहीं। इससे वह तनाव चुपचाप सुलझ जाता है जिसे अध्याय 3 और 5 ने “कर्म का संन्यास करो” और “आसक्ति के बिना कर्म करो” के बीच अनसुलझा छोड़ दिया था — ये वास्तव में कभी एक ही निर्देश थे ही नहीं, और कृष्ण शुरू से कर्मयोग के रूप में जिसकी सलाह देते आ रहे हैं, वह संन्यास नहीं, त्याग है। वे संन्यास को गलत नहीं कहते, केवल त्याग से संकीर्ण बताते हैं — यह ऊँच-नीच का क्रम श्लोक 7 में तीन गुणों का विश्लेषण शुरू होते ही स्पष्ट हो जाता है। संन्यास कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ता है; त्याग सभी कर्मों के फल को छोड़ता है — पर गीता 18.6 दिखाएगा कि दोनों एक ही साधना पर आकर मिलते हैं। यह गीता 5.2–गीता 5.6 वाला एकीकरण ही है, जिसे इस समापन अध्याय के लिए फिर से कहा गया है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃकांयानां कर्मणां न्यासं
कामना से प्रेरित कर्मों को छोड़ देना (kāmyānām + karmaṇām + nyāsam)
saṃnyāsaṃ kavayo viduḥसंन्यासं कवयो विदुः
ज्ञानी जन संन्यास के रूप में जानते हैं (saṃnyāsam + kavayaḥ + viduḥ)
sarvakarmaphalatyāgaṃसर्वकर्मफलत्यागं
सभी कर्मों के फल का त्याग (sarva-karma-phala-tyāgam)
prāhus tyāgaṃ vicakṣaṇāḥप्राहुस् त्यागं विचक्षणाः
विवेकी जन त्याग कहते हैं (prāhuḥ + tyāgam + vicakṣaṇāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The Sanskrit couplet balances the two definitions on strictly parallel grammar — desire-driven action renounced in one clause, the fruit of all action renounced in the other — so the distinction arrives less as an argument than as a shape the ear can catch before the sense fully lands. That built-in parallelism is doing real philosophical work: it’s what lets two words that sound like near-synonyms in ordinary speech get treated as structurally distinct for the rest of the chapter.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Each definition is credited to a different class of knower — “kavayaḥ,” the sages or poets, for sannyasa; “vicakṣaṇāḥ,” the discerning, for tyaga — rather than the verse simply saying “some call it this, others call it that” as competing opinions. That attribution implies a hierarchy of insight, not a disagreement: recognizing that giving up desire-driven action is a kind of renunciation is the more available observation, while seeing that only the fruit need be relinquished is credited to the sharper, more discriminating eye.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी चीज़ को 'छोड़ने' का निर्णय लेने से पहले स्पष्ट कर लें कि आप दो बिल्कुल अलग बातों में से किसकी बात कर रहे हैं: स्वयं उस काम को बंद करना, या उसके परिणाम पर अपनी पकड़ ढीली करना। दोनों को एक मान लेने से या तो आप वे काम छोड़ बैठते हैं जिन्हें छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी, या उन परिणामों से चिपके रहते हैं जिन्हें आप छोड़ना चाहते थे।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी परियोजना से पीछे हटें, तो अपनी टीम को साफ़-साफ़ बताएँ कि यह किस तरह का पीछे हटना है — स्वयं काम किसी और को सौंप देना, या जुड़े रहते हुए केवल श्रेय पाने की अपनी चाह छोड़ देना। दोनों को एक ही कदम मान लेने से सब उलझन में पड़ जाते हैं कि वास्तव में बदला क्या है।

परिवार और समाज

  • यदि आप परिवार के किसी सदस्य से कहते हैं कि आप किसी पुराने मतभेद को 'छोड़' रहे हैं, तो स्पष्ट करें कि आपका आशय उस विषय को पूरी तरह छोड़ देना है या केवल उस पर स्वयं को सही सिद्ध करने की अपनी आसक्ति छोड़ना — इन दोनों से आगे चलकर रिश्ते बहुत अलग बनते हैं।

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