18.10

संस्कृत

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥

na dveṣṭy akuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ

अनुवाद

सत्त्व से परिपूर्ण, मेधावी और संशयों से मुक्त त्यागी न तो अप्रिय कर्म से द्वेष करता है और न ही प्रिय कर्म में आसक्त होता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कृष्ण इस सात्त्विक त्यागी का मनोवैज्ञानिक चित्र खींचते हैं: शुद्ध, बुद्धिमान, संशय से मुक्त, और — जो बहुत कुछ कह जाता है — ऐसा व्यक्ति जो न अप्रिय कर्तव्य से द्वेष करता है और न प्रिय कर्तव्य से चिपका रहता है। स्वयं कार्य के प्रति यह समभाव, इस बात से स्वतंत्र कि वह संयोग से रुचिकर है या नहीं, वही समता है जिसकी माँग अध्याय 2 ने परिणामों के प्रति की थी, पर यहाँ उसे कार्य के अनुभव किए जाने वाले स्वरूप पर ले आया गया है। सच्चे त्यागी की पहचान: अप्रिय कार्य के प्रति कोई अरुचि नहीं, प्रिय कार्य से कोई चिपकाव नहीं — गीता 2.57 का “न हर्षित होता है, न पीछे हटता है”, अब त्याग की परिभाषा बन गया है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na dveṣṭy akuśalaṃ karmaन द्वेष्ट्य् अकुशलं कर्म
वह अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता (na + dveṣṭi + akuśalam + karma)
kuśale nānuṣajjateकुशले नानुषज्जते
और न प्रिय में आसक्त होता है (kuśale + na + anuṣajjate)
tyāgī sattvasamāviṣṭoत्यागी सत्त्वसमाविष्टो
सत्त्व से युक्त त्यागी (tyāgī + sattva-samāviṣṭaḥ)
medhāvī chinnasaṃśayaḥमेधावी छिन्नसंशयः
बुद्धिमान, जिसका संशय कट चुका है (medhāvī + chinna-saṃśayaḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The profile is drawn entirely in negatives — doesn’t hate the unpleasant task, isn’t attached to the pleasant one — with no positive description of what this person actually feels while working supplied at all. Defining a state by what it refuses on both sides, rather than by any feeling it does have, is the same move avyakta gets defined by elsewhere in this text: some things in the Gita are easier to point at by what they aren’t than by what they are.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जो काम आपको नापसंद है, उसके प्रति ज़बरदस्ती कोई अच्छी भावना गढ़ने की ज़रूरत नहीं है — अपना लक्ष्य यह रखना काफ़ी है कि 'न उस काम से डरूँ, न किसी मज़ेदार विकल्प की लालसा करूँ', और अक्सर यह ख़ुद को उस काम के बारे में अच्छा महसूस करने के लिए मजबूर करने से ज़्यादा संभव होता है।

व्यावसायिक

  • अपने काम के बोझ पर भी यही दोहरा 'न-न' वाला मानदंड लागू करें: लक्ष्य यह हो कि न उबाऊ टिकटों से खीझें और न रोमांचक टिकटों से ज़रूरत से ज़्यादा जुड़ जाएँ। काम के प्रति यही संतुलित भाव, न कि हर काम के लिए गढ़ा हुआ प्रेम, असल में काम पर स्थिरता का रूप है।

परिवार और समाज

  • घर के कामों में, उबाऊ कामों के लिए उत्साह महसूस करने या मज़ेदार कामों को पसंद करने पर अपराध-बोध महसूस करने की कोशिश न करें — लक्ष्य यह रखें कि न एक से खीझें और न दूसरे की लालसा करें, और उस संतुलित भाव को वह काम करने दें जिसका श्रेय आमतौर पर समभाव को दिया जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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