18.19

संस्कृत

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥

jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ procyate guṇasaṅkhyāne yathāvac chṛṇu tāny api

अनुवाद

गुणों की गणना करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही बताए गए हैं। उन्हें भी तुम यथावत् सुनो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कृष्ण पद्धति को लागू करने से पहले उसका नाम स्पष्ट रूप से बता देते हैं: ज्ञान, कर्म और कर्ता — इनमें से प्रत्येक गुण के अनुसार तीन प्रकार का है, और वे अर्जुन से कहते हैं कि जैसे-जैसे हर त्रयी को क्रम से खोला जाए, वे ध्यान से सुनें। यहाँ यह अध्याय समापन-शिखर का काम कर रहा है — त्रिगुण का वही दृष्टिकोण, जिसे अध्याय 14 ने समूची प्रकृति पर और अध्याय 17 ने श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान पर लागू किया था, अब नैतिक कर्म की पूरी शब्दावली पर चलाया जा रहा है। गुणसंख्यान — “गुणों की गणना”, अर्थात् सांख्य। अध्याय 18 अध्याय 14 के तीन गुणों को क्रम से ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख पर लागू करता है — यह इस काव्य का सबसे व्यवस्थित अंश है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

jñānaṃ karma ca kartā caज्ञानं कर्म च कर्ता च
ज्ञान, कर्म और कर्ता (jñānam + karma + ca + kartā + ca)
tridhaiva guṇabhedataḥत्रिधैव गुणभेदतः
गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही (tridhā + eva + guṇa-bhedataḥ)
procyate guṇasaṅkhyāneप्रोच्यते गुणसङ्ख्याने
गुणों की गणना में कहे गए हैं (procyate + guṇa-saṅkhyāne)
yathāvac chṛṇu tāny apiयथावच् छृणु तान्य् अपि
उन्हें भी यथावत् सुनो (yathāvat + śṛṇu + tāni + api)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“Hear thou duly these also” is Krishna flagging his own material as harder to follow than what came before — an explicit change of pedagogical gear, not unlike a technical speaker pausing to say “this next part needs your full attention” before wading into denser content. The chapter has earned the right to ask for this by having already walked Arjuna through tyaga’s threefold structure once, in verses 7-10, before scaling the same method up to six more categories.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी सीखी जा रही चीज़ के सचमुच कठिन हिस्से पर पहुँचें, तो अपने आप से साफ़-साफ़ कहें — 'इस हिस्से पर ज़्यादा ध्यान चाहिए' — बजाय इसके कि आप उसे भी उसी रफ़्तार से निपटाते चले जाएँ जिस रफ़्तार से पहले की आसान सामग्री पढ़ी थी। कठिनाई में आए इस बदलाव को नाम देना अपने आप में पढ़ाई की एक तकनीक है।

व्यावसायिक

  • जब आप प्रस्तुति दे रहे हों और अधिक गहन, तकनीकी सामग्री की ओर बढ़ने वाले हों, तो इसे ज़ोर से कहें — 'अगले हिस्से पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है' — यह मानकर न चलें कि आपके श्रोता अपने आप आपके साथ अपनी गति बदल लेंगे। एक स्पष्ट संकेत वह असली काम करता है जो अकेले आवाज़ का लहजा नहीं कर पाता।

परिवार और समाज

  • जब आप अपने जीवनसाथी या बच्चे को कोई ऐसी बात समझाने वाले हों जो अब तक की बातचीत से ज़्यादा मायने रखती है, तो सीधे-सीधे कहें 'अगली बात ज़रूरी है, मैं चाहता हूँ कि तुम सच में ध्यान से सुनो' — यह न मानें कि वे बात की गंभीरता में आए बदलाव को अपने आप भाँप लेंगे।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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