संस्कृत
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
kāryam ity eva yat karma niyataṃ kriyate'rjuna saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ
अनुवाद
हे अर्जुन, जो नियत कर्म "यह करना ही चाहिए" ऐसा मानकर, आसक्ति और फल दोनों को त्यागकर किया जाता है, वह त्याग सात्त्विक माना गया है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
सात्त्विक स्थिति, और वही जिसका कृष्ण वास्तव में समर्थन करते हैं: नियत कर्तव्य को केवल इसलिए करना कि उसे किया जाना चाहिए, और साथ ही उसके प्रति आसक्ति तथा उसके फल का त्याग करना। यहाँ त्याग ठीक उसी तरह काम करता है जिस तरह अध्याय 3 में कर्मयोग की परिभाषा दी गई थी — कर्म बना रहता है, परिणाम पर दावा छोड़ दिया जाता है। इससे पुष्टि होती है कि कृष्ण पूरे समय जिसे “त्याग” कहते हैं, उसका अर्थ काम रोकना नहीं, बल्कि काम के साथ अपना संबंध बदलना है। सात्त्विक त्याग: वह कर्म जो इसलिए किया जाता है क्योंकि उसे करना अपना दायित्व है, और जिसमें आसक्ति तथा फल छोड़ दिए गए हैं। कम करना नहीं — वही करना, पर अलग ढंग से। यही वह लक्ष्य है जिसके चारों ओर पूरा अध्याय घूमता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- kāryam ity eva yat karmaकार्यं इत्य् एव यत् कर्म
- 'यह करना ही चाहिए' — ऐसा मानकर जो कर्म (kāryam + iti + eva + yat + karma)
- niyataṃ kriyate'rjunaनियतं क्रियतेऽर्जुन
- नियत रूप से किया जाता है, हे अर्जुन (niyatam + kriyate + arjuna)
- saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caivaसङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव
- आसक्ति और फल को भी त्यागकर (saṅgam + tyaktvā + phalam + ca + eva)
- sa tyāgaḥ sāttviko mataḥस त्यागः सात्त्विको मतः
- वह त्याग सात्त्विक माना गया है (saḥ + tyāgaḥ + sāttvikaḥ + mataḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Because it ought to be done” is a justification that refuses to go further — Krishna doesn’t have the sattvic actor add a because after that, the way the rajasic actor adds “because it’s painful” and the tamasic actor acts from a delusion that could itself be unpacked further. Sattvic motivation, as this verse frames it, is the one that doesn’t need a further reason behind the reason; the other two only look justified until you ask why the pain or the confusion mattered enough to move them.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
The verse specifies “niyataṃ karma” — prescribed or obligatory action, not action in general — and that qualifier does real limiting work. This isn’t license to call any task you’ve decided is virtuous an “ought” and perform it with sattvic detachment; it praises relinquishing attachment specifically within duty already incumbent on you. Read past the qualifier and the verse would justify self-appointed crusades as easily as assigned responsibilities, which is exactly the reading the word “niyataṃ” forecloses.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि कोई काम करने का आपका कारण किसी साफ़ बिंदु पर जाकर पूरा हो जाता है — 'क्योंकि यह ज़रूरी है' — या उसके नीचे बार-बार किसी और कारण की ज़रूरत पड़ती रहती है। जिस औचित्य के पीछे किसी और औचित्य की ज़रूरत न हो, आम तौर पर उसी के आधार पर काम करना अधिक भरोसेमंद होता है।
व्यावसायिक
- कोई काम हाथ में लेना है या नहीं, यह तय करते समय जाँचें कि उसे करने का आपका कारण अपने आप में पूरा है — 'इसे सचमुच किया जाना चाहिए' — या इस डर पर टिका है कि न करने पर कैसा लगेगा। अपने आप में पूरे कारणों से आम तौर पर काम ज़्यादा स्थिरता से पूरा होने की उम्मीद रहती है, बजाय उन कारणों के जो किसी परिणाम से बचने पर बने हों।
परिवार और समाज
- जब आप परिवार की कोई बार-बार आने वाली ज़िम्मेदारी निभाते रहते हैं, तो ध्यान दें कि उसका आपका कारण सरल और पूरा है या उसके नीचे बार-बार और सफ़ाई देने की ज़रूरत पड़ती रहती है — जिस कारण का और बचाव न करना पड़े, आम तौर पर उसी के आधार पर काम करते रहना अधिक स्वस्थ होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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