संस्कृत
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
śarīravāṅmanobhir yat karma prārabhate naraḥ nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ
अनुवाद
मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे वह उचित हो या उसके विपरीत, उसके ये पाँच कारण हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
मनुष्य जो कुछ भी करता है — शरीर से, वाणी से या मन से, चाहे वह उचित हो या उसके विपरीत — उसका मूल इन्हीं पाँच कारणों में है। कारणों के इस विश्लेषण को शारीरिक कर्म के साथ-साथ वाणी और विचार तक फैलाने से एक स्पष्ट बच निकलने का रास्ता बंद हो जाता है: बात केवल दिखाई देने वाले कर्म की नहीं है, बल्कि उस सब की है जो मनुष्य किसी भी स्तर पर “करता” है। “उचित या अनुचित” — न्याय्य या विपरीत — दोनों में समान रूप से पाँच कारण होते हैं। यह विश्लेषण निष्पक्ष है: यह बुरे कर्म को क्षमा नहीं करता, बल्कि अहंकार के इस दावे को मिटा देता है कि वही उसका एकमात्र स्रोत है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- śarīravāṅmanobhir yat karmaशरीरवाङ्मनोभिः यत् कर्म
- शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म (śarīra-vāk-manobhiḥ + yat + karma)
- prārabhate naraḥप्रारभते नरः
- मनुष्य आरम्भ करता है (prārabhate + naraḥ)
- nyāyyaṃ vā viparītaṃ vāन्याय्यं वा विपरीतं वा
- चाहे उचित हो या उसके विपरीत (nyāyyam + vā + viparītam + vā)
- pañcaite tasya hetavaḥपञ्चैते तस्य हेतवः
- ये पाँच उसके कारण हैं (pañca + ete + tasya + hetavaḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This line quietly raises the stakes on every verse before it: if the same five causes and the same guna analysis apply to speech and thought as much as to physical deeds, then “sattvic action” was never only about what your hands do — an unkind word or a resentful thought, produced through the same five-cause machinery, is under the same scrutiny as a visible act. The chapter’s ethics turn out to cover far more of a day than the word “action” first suggested.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी बड़े निर्णय की आप जैसी जाँच-परख करते हैं, वैसी ही जाँच अपने रोज़मर्रा के शब्दों और मन ही मन खुद से होने वाली बातचीत की भी करें — मन में उठा कोई कड़वाहट भरा विचार या कोई तीखी टिप्पणी भी कारणों के उसी तंत्र से होकर गुज़रती है जिससे कोई भी दिखाई देने वाला कर्म, इसलिए उसके पीछे के उद्देश्य को भी उतनी ही ईमानदारी से देखना चाहिए, न कि केवल इसलिए उसे छूट दे दी जाए कि किसी ने उसे देखा नहीं।
व्यावसायिक
- याद रखें कि बैठक में की गई कोई उपेक्षा भरी टिप्पणी या कोई रूखा संदेश भी एक कर्म है, जिसका वज़न उतना ही है जितना किसी लागू किए जा चुके निर्णय का — यदि आप किसी बड़े फ़ैसले के पीछे के उद्देश्य की जाँच करते हैं, तो वैसी ही जाँच उन बातों की भी करें जिन्हें कहते समय आपको लगता है कि उनकी उतनी 'गिनती' नहीं होती।
परिवार और समाज
- घर में झुँझलाहट में बोला गया कोई तीखा शब्द उस कर्म से कम महत्त्व की घटना नहीं है जिसके लिए आप माफ़ी माँगते — वह भी उसी स्रोत से आता है और उसके भी वास्तविक परिणाम होते हैं, इसलिए उसके पीछे क्या था, इसे भी उतनी ही ईमानदारी से देखें जितनी ईमानदारी से आप अपने किसी भी अन्य चुनाव को देखते।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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