संस्कृत
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
svabhāva-jena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā kartuṃ necchasi yan mohāt kariṣyasy avaśo'pi tat
अनुवाद
हे कौन्तेय, अपने स्वभाव से उत्पन्न अपने ही कर्म से बँधे हुए तुम, मोह के कारण जिसे करना नहीं चाहते, उसे भी विवश होकर करोगे।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
भ्रम को तोड़ने का क्रम जारी है: अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्तव्य से बँधे अर्जुन मोह के कारण जिस कर्म को करने से इनकार कर रहे हैं, उसे वे विवश होकर फिर भी करेंगे। कृष्ण का दावा केवल इतना नहीं है कि युद्ध करना अर्जुन के लिए अच्छा होगा, बल्कि यह है कि इनकार का विकल्प उनके पास वास्तव में कभी था ही नहीं — स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे होने के कारण वे क्षत्रिय की तरह ही कर्म करेंगे, चाहे उनका अहंकार इसकी सहमति दे या न दे। यह एक कठोर नियतिवादी स्वर है, जो जानबूझकर, और असहज रूप से, उस स्वतंत्रता के बगल में रखा गया है जिसे कृष्ण कुछ ही श्लोक बाद, 63 में, स्पष्ट रूप से अर्जुन को लौटा देते हैं। स्वभावजेन कर्मणा निबद्धः… अवशोऽपि — “अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हुए तुम, जिस काम को अभी मोह के कारण करने से इनकार कर रहे हो, उसे विवश होकर भी करोगे।” मन के पीछे हट जाने से क्षत्रिय का स्वभाव क्षत्रिय का होना बंद नहीं कर देता।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- svabhāva-jena kaunteya nibaddhaḥस्वभाव-जेन कौन्तेय निबद्धः
- हे कौन्तेय, स्वभावजन्य, बँधे हुए (svabhāva-jena + kaunteya + nibaddhaḥ)
- svena karmaṇāस्वेन कर्मणा
- अपने ही कर्म से (svena + karmaṇā)
- kartuṃ necchasi yan mohātकर्तुं नेच्छसि यन् मोहात्
- मोह के कारण जिसे तुम करना नहीं चाहते (kartum + na + icchasi + yat + mohāt)
- kariṣyasy avaśo'pi tatकरिष्यस्य् अवशोऽपि तत्
- विवश होकर भी तुम उसे करोगे (kariṣyasi + avaśaḥ + api + tat)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t promise Arjuna’s reluctance will dissolve — moha, the delusion behind “I don’t want to,” is allowed to keep operating right alongside the compelled action. Agreement was never the precondition for the outcome; svabhava’s given form as karma acts through the resistance, not after it clears. That’s a stranger claim than simple determinism: not that Arjuna will come around, but that he’ll act while still, in some sense, unconvinced.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जिस ओर आपका अपना गहरा स्वभाव आपको स्पष्ट रूप से खींच रहा है, उससे पूरी तरह सहमत होना या उसके लिए तैयार महसूस करना ज़रूरी नहीं है — अनिच्छा और विवश होकर किया गया कर्म साथ-साथ रह सकते हैं, इसलिए स्वयं को आगे बढ़ने देने से पहले भीतर की सहमति की प्रतीक्षा न करें।
व्यावसायिक
- टीम का कोई सदस्य यदि ऐसी भूमिका में बदलाव का विरोध कर रहा है जो स्पष्ट रूप से उसकी क्षमताओं के अनुकूल है, तो पहले उसकी पूरी सहमति ज़रूरी नहीं है — कभी-कभी ईमानदार रास्ता यही होता है कि अनिच्छा रहते हुए भी उसे उस भूमिका में कदम रखने दिया जाए, बजाय ऐसी सहमति की प्रतीक्षा करने के जो शायद कभी पूरी तरह आए ही नहीं।
परिवार और समाज
- आपके परिवार का कोई सदस्य भीतर से असहमत या अनिच्छुक रहते हुए भी रिश्ते के लिए सही काम कर सकता है — उससे यह अपेक्षा न करें कि वह पहले पूरी तरह सहमत महसूस करे; कुछ समय तक कर्म और बचे हुए संदेह को साथ-साथ रहने दें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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