18.36

संस्कृत

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥

sukhaṃ tv idānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati

अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ, अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में भी सुनो। वह सुख, जिसमें मनुष्य अभ्यास से आनन्द पाता है और जिससे वह दुःख के अन्त तक पहुँच जाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अंतिम त्रयी, सुख, एक वचन से आरंभ होती है: सात्त्विक सुख वह है जिसका आनंद व्यक्ति केवल निरंतर अभ्यास से ही लेने लगता है, और जो अंततः दुःख का अंत कर देता है — यह निवेश जैसी संरचना है, तुरंत मिलने वाला फल नहीं। यह सीधे अध्याय 14 के उस वर्णन के समानांतर है जिसमें सत्त्वगुण की गति — ज्ञानियों के निर्मल लोकों की ओर उठना — ऐसी चीज़ के रूप में बताई गई है जो माँगते ही नहीं मिलती, बल्कि समय के साथ विकसित की जाती है। अंतिम त्रयी: सुख, अर्थात् स्वयं प्रसन्नता, जिसे गुण के अनुसार बाँटा गया है। सात्त्विक सुख के लिए अभ्यास आवश्यक है — यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली रुचि है, “आरंभ में विष के समान” (गीता 18.37)।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

sukhaṃ tv idānīṃ trividhaṃसुखं त्व् इदानीं त्रिविधं
और अब तीन प्रकार का सुख (sukham + tu + idānīm + trividham)
śṛṇu me bharatarṣabhaशृणु मे भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ, मुझसे सुनो (śṛṇu + me + bharata-ṛṣabha)
abhyāsād ramate yatraअभ्यासाद् रमते यत्र
जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है (abhyāsāt + ramate + yatra)
duḥkhāntaṃ ca nigacchatiदुःखान्तं च निगच्छति
और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है (duḥkha-antam + ca + nigacchati)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The word doing the load-bearing work here is abhyasat, through practice, the identical term chapter 6 used for training a wandering mind back again and again. Reusing it for happiness rather than introducing separate vocabulary makes a strong claim: contentment isn’t a different kind of achievement from meditative steadiness, it’s produced by the same repeated-return method aimed at a different target.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • यदि सुख का कोई स्रोत पहली कुछ बार आज़माने पर संतोष न दे, तो इसे इस बात का प्रमाण न मानें कि वह आपके लिए नहीं है — यह श्लोक सात्त्विक सुख को ऐसी चीज़ बताता है जो उसी बार-बार करने और बार-बार लौटने के अभ्यास से बनती है, जिसका उपयोग आप एकाग्रता साधने के लिए करते हैं।

व्यावसायिक

  • ऐसे काम से जुड़ने को, जो सचमुच मूल्यवान हो पर शुरू में संतोष न दे — कोई नया कौशल, कोई कठिन परियोजना — एक अभ्यास मानें, जिसकी ओर दोहराव के ज़रिए बढ़ा जाता है, न कि कोई रुचि जिसके जागने की प्रतीक्षा की जाए; यहाँ संतोष को खोजी हुई नहीं, बल्कि बनाई हुई चीज़ बताया गया है।

परिवार और समाज

  • रिश्ते की कोई आदत जो अभी आनंद न देती हो — रोज़ रात का हालचाल, साथ मिलकर किया गया घर का कोई काम — फिर भी बनते हुए सात्त्विक सुख का रूप हो सकती है; यह तय करने से पहले कि वह कारगर है या नहीं, उसे वैसा ही बार-बार का अभ्यास दें जैसा आप किसी भी कौशल को देते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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