संस्कृत
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
sve sve karmaṇy abhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ svakarma-nirataḥ siddhiṃ yathā vindati tac chṛṇu
अनुवाद
अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
चारों कर्तव्यों का वर्णन करने के बाद, कृष्ण इसका फल स्पष्ट शब्दों में बताते हैं: सिद्धि उनमें से “सर्वश्रेष्ठ” कर्तव्य चुनने से नहीं मिलती, बल्कि जो भी कर्तव्य अपना हो, उसी में पूरी तरह लीन (अभिरत) रहने से मिलती है। अध्याय के चरम बिंदु से पहले यह कर्मयोग के व्यावहारिक सार को अंतिम बार फिर से कहना है — किसी कर्म का मूल्य कभी उसकी विषय-वस्तु में नहीं था, बल्कि उसमें लगाई गई संलग्नता की गुणवत्ता में था। “अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।” कोई विशेष कर्म नहीं — अपना कर्म। गीता 18.46 इसकी प्रक्रिया बताता है: उस कर्म को सभी प्राणियों के स्रोत की उपासना के रूप में करना।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sve sve karmaṇy abhirataḥस्वे स्वे कर्मण्य् अभिरतः
- अपने-अपने कर्म में लगा हुआ (sve + sve + karmaṇi + abhirataḥ)
- saṃsiddhiṃ labhate naraḥसंसिद्धिं लभते नरः
- मनुष्य परम सिद्धि पाता है (saṃsiddhim + labhate + naraḥ)
- svakarma-nirataḥ siddhiṃ yathāस्वकर्म-निरतः सिद्धिं यथा
- अपने कर्म में लीन होकर सिद्धि जिस प्रकार (sva-karma-nirataḥ + siddhim + yathā)
- vindati tac chṛṇuविन्दति तच् छृणु
- पाता है, वह सुनो (vindati + tat + śṛṇu)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verse names one’s own duty twice in two lines, sve sve karmani and svakarma-niratah, which reads almost like redundancy until you notice what it’s describing: absorption, being steeped in a thing to the point of repetition. A verse about the value of staying with one thing rather than restlessly seeking a better one is, in its own construction, staying with the same phrase rather than reaching for a different way to say it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- यदि कोई अभ्यास इतना दोहराव भरा लगे कि ऊब होने लगे, तो हो सकता है कि वही दोहराव असल में काम कर रहा हो। यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि आपको किसी नई चीज़ की ओर मुड़ जाना चाहिए। तल्लीनता टिके रहने जैसी दिखती है, विविधता जैसी नहीं।
व्यावसायिक
- जो टीम अगली नई कार्यप्रणाली के पीछे भागने के बजाय बार-बार उसी मूल प्रक्रिया पर लौटती है, हो सकता है वह सच्ची महारत का गहरा काम कर रही हो। दोहराव को ठहराव मान लेने से पहले जाँच लें कि वह वास्तव में गहराई ला रहा है या नहीं।
परिवार और समाज
- किसी प्रियजन के साथ बार-बार दोहराई जाने वाली कोई छोटी-सी रस्म, जैसे रात को एक-दूसरे का हाल पूछना या रविवार का फ़ोन, इसलिए ख़ास होने से नहीं चूकती कि वह हर बार नई नहीं होती। दोहराव ही वह चीज़ है जो उसे रिश्ते का सहारा बनाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।