18.32

संस्कृत

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसा वृता । सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥

adharmaṃ dharmam iti yā manyate tamasā vṛtā sarvārthān viparītāṃś ca buddhiḥ sā pārtha tāmasī

अनुवाद

हे पार्थ, जो बुद्धि तमस् से ढकी हुई अधर्म को धर्म मानती है और सभी बातों को उलटा ही देखती है, वह बुद्धि तामसी है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

तामसिक बुद्धि भ्रम से भी आगे बढ़कर सीधे उलटेपन तक पहुँच जाती है — अंधकार से घिरी हुई, वह गलत को सही मान लेती है और हर चीज़ को “उलटा” देखती है। तीनों विफलताओं में यह सबसे तीखी है और एक स्पष्ट क्रम को पूरा करती है: सत्त्व सही विवेक करता है, रजस् अविश्वसनीय विवेक करता है, तमस् उलटा विवेक करता है। तामसिक बुद्धि पूरी तरह उलटी होती है — अधर्मं धर्मम् इति मन्यते, “गलत को सही मान लेती है,” और “सब कुछ उलटा” देखती है। यह नैतिक अंधकार का गुण है, तमस् में लिपटा हुआ।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

adharmaṃ dharmam iti yāअधर्मं धर्मं इति या
जो अधर्म को धर्म मानती है (adharmam + dharmam + iti + yā)
manyate tamasā vṛtāमन्यते तमसा वृता
मानती है, अंधकार से ढकी हुई (manyate + tamasā + vṛtā)
sarvārthān viparītāṃś caसर्वार्थान् विपरीतांश् च
और सभी बातों को उलटा [देखती है] (sarva-arthān + viparītān + ca)
buddhiḥ sā pārtha tāmasīबुद्धिः सा पार्थ तामसी
हे पार्थ, वह बुद्धि तामसी है (buddhiḥ + sā + pārtha + tāmasī)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 31’s rajasic error was scoped: confusion about specific categories, dharma from adharma, right action from wrong. This verse’s failure carries no such limit — sarvarthan, all things, are seen subverted. The progression from sattva to rajas to tamas isn’t just getting worse by degree; the error spreads from patchy miscalibration in particular judgments to a totalizing inversion of everything at once.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि आपकी उलझन कुछ खास स्थितियों तक ही सीमित है या वह हर चीज़ के बारे में एक कठोर, सर्वव्यापी नज़रिया बन चुकी है — हर चीज़ में धाँधली है, कुछ भी काम नहीं करता। दूसरी स्थिति पहली से कहीं गहरी समस्या है और उसे एक अलग तरह की मदद चाहिए।

व्यावसायिक

  • किसी टीम के इक्के-दुक्के गलत फ़ैसलों में, जो छिटपुट होते हैं और एक-एक करके सुधारे जा सकते हैं, और एक व्यवस्थागत उलटे विश्वदृष्टिकोण में — यहाँ कभी कुछ नहीं सुधरता — भेद करें। इस दूसरी स्थिति में अलग-अलग फ़ैसलों को एक-एक बार सुधारने के बजाय ढाँचागत हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

परिवार और समाज

  • किसी व्यक्ति के किसी एक बार-बार उठने वाले विषय पर कभी-कभार के कमज़ोर विवेक और अपने आसपास के सभी लोगों के प्रति पूरी तरह उलटे नज़रिए में वास्तविक अंतर है। दूसरी स्थिति को केवल बारीकियों पर सुधार की नहीं, बल्कि सच्चे सहारे की ज़रूरत के रूप में देखें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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