संस्कृत
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
kaccid etac chrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā kaccid ajñāna-sammohaḥ praṇaṣṭas te dhanañjaya
अनुवाद
हे पार्थ, क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय, क्या अज्ञान से उत्पन्न तुम्हारा मोह नष्ट हो गया?
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
कृष्ण का उपदेश किसी अंतिम घोषणा से नहीं, बल्कि अपने शिष्य से सीधे पूछे गए एक प्रश्न से समाप्त होता है: क्या यह एकाग्र मन से सुना गया, और क्या अज्ञान से उपजा मोह सचमुच नष्ट हो गया? यह संरचना का एक सोचा-समझा चुनाव है — अठारह अध्यायों का दर्शन अपनी सफलता की घोषणा स्वयं करने से इनकार करते हुए समाप्त होता है, और यह निर्णय पूरी तरह अर्जुन के अगले शब्दों पर छोड़ देता है। कृष्ण का अंतिम प्रश्न उसी एक बात को जाँचता है जो वास्तव में मायने रखती है: क्या अज्ञान-सम्मोह — वह मोह जिसका नाम अर्जुन ने गीता 1.30 में लिया था — दूर हो गया है? पूरा उपदेश इसी लक्ष्य की ओर था।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- kaccid etac chrutaṃ pārthaकच्चिद् एतच् छ्रुतं पार्थ
- हे पार्थ, क्या तुमने इसे सुना (kaccit + etat + śrutam + pārtha)
- tvayaikāgreṇa cetasāत्वयैकाग्रेण चेतसा
- तुमने एकाग्र चित्त से (tvayā + eka-agreṇa + cetasā)
- kaccid ajñāna-sammohaḥकच्चिद् अज्ञान-संमोहः
- क्या अज्ञान से उत्पन्न मोह (kaccit + ajñāna-sammohaḥ)
- praṇaṣṭas te dhanañjayaप्रणष्टस् ते धनञ्जय
- हे धनञ्जय, तुम्हारा मोह नष्ट हो गया (praṇaṣṭaḥ + te + dhanañjaya)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna asks two separate questions, not one: was this heard with a focused mind, and has the delusion actually gone. The two aren’t assumed to be the same achievement — you can pay full, one-pointed attention to something and still walk away just as confused as before. Checking both separately concedes that comprehension and transformation aren’t the same event.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी चीज़ पर अपना पूरा ध्यान दे चुके हों — कोई किताब, कोई कठिन बातचीत, कोई थेरेपी सत्र — तो अलग से यह जाँचें कि क्या उसने सचमुच आपके भीतर कुछ बदला, क्योंकि ध्यान देना और सचमुच बदलना दो अलग-अलग उपलब्धियाँ हैं, एक नहीं।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम किसी समीक्षा-बैठक या प्रशिक्षण में पूरी तरह भाग ले चुकी हो, तो अलग से यह जाँचें कि क्या व्यवहार सचमुच बदला, न कि केवल यह कि ध्यान दिया गया या नहीं — भागीदारी और वास्तविक बदलाव अलग-अलग परिणाम हैं, और एक दूसरे की गारंटी नहीं देता।
परिवार और समाज
- किसी गंभीर बातचीत के बाद, जिसमें आपके परिवार के किसी सदस्य ने ध्यान से सुना हो, बाद में यह जाँचें कि क्या उसके लिए सचमुच कुछ बदला, बजाय यह मान लेने के कि उस क्षण का पूरा ध्यान ही वास्तविक बदलाव था।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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