संस्कृत
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
yad ahaṅkāram āśritya na yotsya iti manyase mithyaiṣa vyavasāyas te prakṛtis tvāṃ niyokṣyati
अनुवाद
यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम यह सोचते हो कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारी प्रकृति तुम्हें युद्ध में लगा देगी।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
कृष्ण अब अर्जुन की ठीक-ठीक स्थिति को सीधे नाम देते हैं: “अहंकार में जमे हुए तुम सोचते हो, ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा।’” यह उस रुख़ की लगभग शब्दशः प्रतिध्वनि है जिसे अर्जुन ने पूरे अध्याय 1 में अपनाया था और 1.46-47 में अपना धनुष छोड़कर पक्का कर दिया था — कृष्ण अठारह अध्यायों बाद अपने शिष्य का ही संकल्प उसे उद्धृत करके लौटा रहे हैं, ताकि ठीक अगले श्लोक में उसे ध्वस्त कर सकें।
“न योत्स्ये, ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’” — गीता 2.9 में अर्जुन के ठीक यही शब्द — उसे उद्धृत करके लौटाए जाते हैं और मिथ्या व्यवसाय, “झूठा संकल्प”, कहे जाते हैं, क्योंकि “प्रकृति तुम्हें फिर भी विवश कर देगी” (गीता 3.5)। पीछे हटना कभी कोई उपलब्ध विकल्प था ही नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yad ahaṅkāram āśrityaयद् अहङ्कारं आश्रित्य
- यदि अहंकार का आश्रय लेकर (yat + ahaṅkāram + āśritya)
- na yotsya iti manyaseन योत्स्य इति मन्यसे
- तुम मानते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' (na + yotsye + iti + manyase)
- mithyaiṣa vyavasāyas teमिथ्यैष व्यवसायस् ते
- तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है (mithyā + eṣaḥ + vyavasāyaḥ + te)
- prakṛtis tvāṃ niyokṣyatiप्रकृतिस् त्वां नियोक्ष्यति
- प्रकृति तुम्हें लगा देगी (prakṛtiḥ + tvām + niyokṣyati)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t call Arjuna’s resolve wrong, he calls it mithyā — false, mistaken, a prediction that will fail to hold. The line isn’t moral condemnation, it’s a falsifiable claim about what will actually happen despite the resolve: nature will act regardless of what the will decides. Judged on those terms, the very next verse is written to be tested against reality, not against ideals.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप कोई ऐसा संकल्प लेते हैं जो आपके अपने गहरे स्वभाव और अतीत के विरुद्ध जाता है, तो उसके बारे में अपने संदेह को नैतिक कमज़ोरी कम और परखने योग्य एक तथ्यात्मक भविष्यवाणी अधिक मानिए — कभी-कभी ईमानदार प्रश्न यह नहीं होता कि 'क्या यह संकल्प अच्छा है', बल्कि यह होता है कि 'क्या यह सचमुच टिकेगा।'
व्यावसायिक
- जब कोई टीम ऐसी योजना के लिए प्रतिबद्ध होती है जो उसकी अपनी स्थापित क्षमता या प्रोत्साहनों की अनदेखी करती है, तो उसे मूल्यों पर असहमति के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी भविष्यवाणी के रूप में सामने रखें जिसके विफल होने की संभावना है — अधिक उपयोगी आपत्ति अक्सर तथ्यात्मक होती है, नैतिक नहीं।
परिवार और समाज
- जब आपका कोई निकट व्यक्ति ऐसा वादा करता है जो उसके स्वभाव के बारे में आपकी जानी-पहचानी हर बात के विरुद्ध जाता है, तो अपने संदेह को निर्णय के बजाय भविष्यवाणी के रूप में रखें — 'मुझे नहीं लगता कि यह टिकेगा' कहना 'तुम्हारा यह चाहना ग़लत है' कहने से अधिक ईमानदारी से पहुँचता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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