2.9

संस्कृत

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥

evam uktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ parantapaḥ na yotsya iti govindam uktvā tūṣṇīṃ babhūva ha

अनुवाद

शत्रुओं को तपाने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने हृषीकेश से इस प्रकार कहकर, फिर गोविन्द से "मैं युद्ध नहीं करूँगा" — यह कहा और मौन हो गए।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अर्जुन का इनकार पूर्ण और अंतिम है, कम से कम इस क्षण के लिए: “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, और उसके बाद मौन। संजय का यह वर्णन उस संकट के अंत को चिह्नित करता है जिसे अध्याय 1 धीरे-धीरे खड़ा करता आया है — और यह मौन ही वह रिक्त स्थान है जिसे श्लोक 11 से आरंभ होने वाला कृष्ण का उपदेश भरेगा।

ये विशेषण अर्थपूर्ण हैं: अर्जुन को गुडाकेश, अर्थात् निद्रा को जीतने वाला, ठीक उसी पंक्ति में कहा गया है जहाँ उसका विवेक अंधकार में डूब गया है; कृष्ण हृषीकेश हैं, इन्द्रियों के स्वामी, ठीक उस उपदेश को आरंभ करने से पहले जिसका व्यावहारिक सार ही इन्द्रियों पर प्रभुत्व है (गीता 2.58–गीता 2.61)।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

evam uktvāएवं उक्त्वा
ऐसा कहकर (evam + uktvā)
hṛṣīkeśaṃहृषीकेशं
हृषीकेश से
guḍākeśaḥगुडाकेशः
गुडाकेश
parantapaḥपरन्तपः
शत्रुओं को तपाने वाला
na yotsya itiन योत्स्य इति
'मैं युद्ध नहीं करूँगा' — ऐसा (na + yotsye + iti)
govindamगोविन्दं
गोविन्द से
uktvāउक्त्वा
कहकर
tūṣṇīṃतूष्णीं
चुप
babhūva haबभूव ह
हो गया (babhūva + ha)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“I will not fight” is followed immediately by silence — not another argument, not a plea, just tūṣṇīm, quiet. That silence is structurally significant: it’s the one moment in the whole dialogue where Arjuna stops generating reasons, and it’s precisely into that gap, not into an ongoing argument, that Krishna’s teaching gets to arrive starting at verse 11.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप अपनी बात कह चुके हों और आपके पास कहने को कोई और तर्क न बचा हो, तो एक और बात गढ़ने के बजाय स्वयं को सचमुच चुप हो जाने दें — सच्चा मौन, न कि और बोलना, अक्सर वही है जो आपके लिए किसी दूसरे दृष्टिकोण को सचमुच सुनने की जगह बनाता है।

व्यावसायिक

  • किसी असहमति में अपना सबसे मज़बूत पक्ष रख देने के बाद बोलना बंद करें और मौन को बने रहने दें — अपने सबसे अच्छे तर्क के बाद भी तर्क गढ़ते रहना आमतौर पर दृढ़ विश्वास का नहीं, बेचैनी का संकेत होता है, और यह उस जगह को दबा देता है जहाँ आप सामने वाले का पक्ष सचमुच सुन सकते थे।

परिवार और समाज

  • जब किसी अपने के साथ बहस अपने अंत तक पहुँच चुकी हो, तो मौन को एक और बात से भरने की इच्छा को रोकें — एक सच्चा ठहराव अक्सर वही है जो दूसरे व्यक्ति के उत्तर को आप तक सचमुच पहुँचने देता है, बजाय इसके कि उसे बीच में बोलकर दबा दिया जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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