संस्कृत
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
avyakto'yam acintyo'yam avikāryo'yam ucyate tasmād evaṃ viditvainaṃ nānuśocitum arhasi
अनुवाद
यह अव्यक्त कहा जाता है, यह अचिन्त्य है, यह अविकारी है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ वर्णन भौतिक से ज्ञानमीमांसीय हो जाता है: यह स्थापित करने के बाद कि आत्मा को क्या नहीं छू सकता (शस्त्र, तत्त्व), कृष्ण अब कहते हैं कि आत्मा को साधारण इन्द्रिय-बोध या विचार से पकड़ा तक नहीं जा सकता। “अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य” तर्क को अविनाशिता से अबोधगम्यता की ओर ले जाता है — यह दावा श्लोक 29 में फिर स्पष्ट रूप से सामने आता है, जहाँ यह स्वीकार किया गया है कि इसके बारे में सुनने के बाद भी लगभग कोई इसे वास्तव में नहीं समझता। “इसलिए” शब्द बहुत भार उठा रहा है: आत्मा के अविकार्य, अर्थात् परिवर्तन से परे होने से, कृष्ण वह व्यावहारिक निष्कर्ष निकालते हैं जिस पर वे बार-बार लौटते हैं — न अनुशोचितुम् अर्हसि, शोक उचित प्रतिक्रिया नहीं है। श्लोक 27 इसी निष्कर्ष तक पहुँचने का एक दूसरा, स्वतंत्र मार्ग प्रस्तुत करता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- avyakto'yamअव्यक्तोऽयं
- यह अव्यक्त है (avyaktaḥ + ayam)
- acintyo'yamअचिन्त्योऽयं
- यह अचिन्त्य है (acintyaḥ + ayam)
- avikāryo'yam ucyateअविकार्योऽयं उच्यते
- यह अविकारी कहा जाता है (avikāryaḥ + ayam + ucyate)
- tasmādतस्माद्
- इसलिए
- evaṃ viditvainaṃएवं विदित्वैनं
- इसे ऐसा जानकर (evam + viditvā + enam)
- nānuśocitum arhasiनानुशोचितुं अर्हसि
- तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए (na + anuśocitum + arhasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Unthinkable” is doing something odd here — Krishna doesn’t ask Arjuna to fully grasp the self before he stops grieving, he says “knowing him as such” is enough, where “as such” explicitly includes being told the self can’t be grasped by thought. The instruction is to accept a description of something acknowledged to exceed comprehension, and act on that acceptance, without waiting for understanding to catch up first.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपके सामने कुछ ऐसा आए जिसे आप पूरी तरह समझ नहीं पाते — शोक, अनिश्चितता, अधूरी जानकारी के बीच लिया जाने वाला कोई निर्णय — तो यह तय करने से पहले कि आपको कैसे कर्म करना है, उसे बौद्धिक रूप से सुलझा लेना ज़रूरी नहीं है। काम चलाने लायक एक वर्णन स्वीकार कर लेना, भले ही वह स्वयं अपनी अपूर्णता मानता हो, आगे बढ़ने के लिए काफ़ी हो सकता है।
व्यावसायिक
- जब कोई प्रणाली इतनी जटिल हो कि कोई भी उसका पूरा मॉडल न बना सके, तब उसके संचालन के सिद्धांत तय करने से पहले आपको उसकी पूरी समझ की ज़रूरत नहीं है — जो अज्ञात है, उसका एक सीमित और ईमानदार वर्णन स्वीकार कर लेना भी कर्म को सही दिशा दे सकता है।
परिवार और समाज
- जब आपका कोई प्रिय व्यक्ति किसी ऐसी स्थिति से गुज़र रहा हो जिसे आप पूरी तरह समझ नहीं पाते, तो अच्छी तरह साथ देने से पहले आपको उसे पूरी तरह समझ लेना ज़रूरी नहीं है — उसने आपसे जो कहा है, उसे सच मान लेना ही स्नेह और सावधानी से कर्म करने के लिए काफ़ी है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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