संस्कृत
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā samādhāv acalā buddhis tadā yogam avāpsyasi
अनुवाद
श्रुतियों से भ्रमित हुई तुम्हारी बुद्धि जब निश्चल होकर समाधि में अचल ठहर जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त कर लोगे।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
इस अध्याय में कृष्ण के बिना रुके चलने वाले उपदेश का यह अंतिम श्लोक है। जब मन परस्पर विरोधी शास्त्रीय दावों के कारण अलग-अलग दिशाओं में खिंचना बंद कर देता है और समाधि में अचल होकर स्थिर हो जाता है, तो वह स्थिर होना ही योग है। यह जान-बूझकर दी गई एक खुली, लगभग फीकी-सी परिभाषा है, और ठीक इसी कारण अर्जुन अगले ही श्लोक में एक बहुत ठोस प्रश्न पूछते हैं: किसी व्यक्ति में यह वास्तव में कैसा दिखाई देता है? वाक्यांश समाधौ अचला बुद्धिः गीता 2.41 के अनेक शाखाओं वाले मन से शुरू हुई यात्रा को पूरा करता है: बिखरा हुआ → निश्चयी → अचल। अर्जुन का उत्तर “कैसे?” नहीं, बल्कि “ऐसा व्यक्ति कैसा होता है?” है — यही वह प्रश्न है जिससे अध्याय का शेष भाग निकलता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- śrutivipratipannāश्रुतिविप्रतिपन्ना
- श्रुतियों के परस्पर-विरोधी वचनों से भ्रमित (śruti-vipratipannā)
- teते
- तुम्हारी
- yadāयदा
- जब
- sthāsyati niścalāस्थास्यति निश्चला
- निश्चल होकर ठहर जाएगी (sthāsyati + niścalā)
- samādhāv acalā buddhisसमाधाव् अचला बुद्धिस्
- समाधि में अचल बुद्धि (samādhau + acalā + buddhiḥ)
- tadāतदा
- तब
- yogam avāpsyasiयोगं अवाप्स्यसि
- तुम योग को प्राप्त करोगे (yogam + avāpsyasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna’s definition of yoga here is deliberately open — the mind settling, unmoving, in contemplation — and it’s almost anticlimactic after everything that led up to it. That vagueness isn’t a flaw; it’s what provokes Arjuna’s very next question, which is exactly the kind of pointed follow-up an abstract answer should invite rather than avoid.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब कोई आपको ऐसा अमूर्त उत्तर दे जो पूरी तरह समझ में न आए — "बस संतुलन खोजिए", "प्रक्रिया पर भरोसा रखिए" — तो मानो समझ गए हों, इस तरह सिर हिलाने के बजाय उसका ठोस रूप जानने का आग्रह करना ठीक है।
व्यावसायिक
- जब नेतृत्व कोई अस्पष्ट निर्देश थमा दे, तो उपयोगी प्रतिक्रिया न तो चुपचाप पालन करना है और न ही मन-ही-मन उलझे रहना — बल्कि वह सीधा अगला प्रश्न पूछना है जो अर्जुन यहाँ पूछते हैं: रोज़मर्रा में यह वास्तव में कैसा दिखता है?
परिवार और समाज
- यदि आपका जीवनसाथी किसी अमूर्त बात से आपको आश्वस्त करे — "मैं और बेहतर करूँगा" — तो पूछिए कि इस सप्ताह ठोस रूप में वह कैसा दिखेगा, ठीक वैसे ही जैसे अर्जुन कृष्ण से अमूर्त उत्तर से आगे बढ़कर ठोस बातें जानने का आग्रह करते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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