संस्कृत
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
dehī nityam avadhyo'yaṃ dehe sarvasya bhārata tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitum arhasi
अनुवाद
हे भारत, सबके शरीर में रहने वाला यह देही सदा अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह आत्मा की अमरता वाले उस पूरे तर्क की समापन पंक्ति है जो श्लोक 12 से शुरू हुआ था: “आत्मा” के बारे में अब तक जो बात सामान्य रूप से दिखाई गई, उसे अब बिना किसी अपवाद के हर देहधारी प्राणी पर लागू करके कहा गया है — “सबकी देह में रहने वाला”। यह अंतिम बात है, जिसके बाद श्लोक 31 में कृष्ण एक बिल्कुल अलग तरह के तर्क की ओर मुड़ते हैं: आत्मा क्या है, यह नहीं, बल्कि एक योद्धा के रूप में अर्जुन का अपना कर्तव्य क्या माँगता है। सर्वस्य देहे — प्रत्येक की और सबकी देह में — इस विषय को छोड़ने से ठीक पहले इस दावे को सब पर लागू कर देता है: बात कभी भी अकेले अर्जुन की अपनी आत्मा की नहीं थी, बल्कि एक ऐसे तथ्य की थी जो भीष्म, द्रोण और रणभूमि के हर सैनिक पर समान रूप से लागू होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- dehīदेही
- देहधारी आत्मा
- nityamनित्यं
- सदा
- avadhyo'yaṃअवध्योऽयं
- यह अवध्य है (avadhyaḥ + ayam)
- dehe sarvasyaदेहे सर्वस्य
- सबके शरीर में (dehe + sarvasya)
- bhārataभारत
- हे भारत
- tasmātतस्मात्
- इसलिए
- sarvāṇi bhūtāniसर्वाणि भूतानि
- सभी प्राणियों के लिए (sarvāṇi + bhūtāni)
- na tvaṃ śocitum arhasiन त्वं शोचितुं अर्हसि
- तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए (na + tvam + śocitum + arhasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice the scope widens exactly once more before the argument changes tracks entirely — “any creature,” not just the men Arjuna is about to fight. Krishna generalizes the claim as far as it will go, and it’s that completeness, not exhaustion of the topic, that lets him drop metaphysics at verse 31 and pick up an entirely different kind of argument: not what the self is, but what Arjuna’s role requires.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी बात को उतना व्यापक बना चुके हों जितना ईमानदारी से बनाया जा सकता है, तो उसे वहीं छोड़ दें, उसे दोहराते न रहें। अनुशासन यह पहचानने में है कि कोई तर्क अपने पूरे दायरे को कब समेट चुका है, ताकि आप उस बात पर आगे बढ़ सकें जिस पर अब सचमुच निर्णय लेना है।
व्यावसायिक
- जब किसी तकनीकी औचित्य को पूरी हद तक सामान्य रूप दिया जा चुका हो, तो उस सिद्धांत पर बार-बार बहस करना बंद करें और बातचीत को उस विशिष्ट निर्णय की ओर मोड़ें जिसकी रुकावट दूर करने के लिए वह औचित्य था। पूरे हो चुके तर्क को दोहराने से असली निर्णय बस टलता जाता है।
परिवार और समाज
- किसी असहमति में जब आप और कोई दूसरा व्यक्ति एक सामान्य सिद्धांत पर सहमत हो चुके हों, तो उस पर नए-नए कोणों से फिर से बहस करने से बचें। उस विशिष्ट, व्यावहारिक प्रश्न की ओर बढ़ें जिसे सुलझाने के लिए वह सिद्धांत था।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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