संस्कृत
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
tasmād yasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā
अनुवाद
इसलिए, हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से पूरी तरह रोक ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह “इसलिए” चेतावनियों के उस पूरे क्रम को समाप्त करता है जो श्लोक 60 से शुरू हुआ था: जब एक असावधान इन्द्रिय इतनी आसानी से मन को उलट सकती है, तो संयम पूर्ण होना चाहिए, आंशिक नहीं। इस चित्रण में यह चौथी बार है जब ठीक यही टेक — “प्रज्ञा प्रतिष्ठिता”, यानी बुद्धि सुस्थिर — किसी श्लोक के अंत में आई है। इससे यह रेखांकित होता है कि पूरे प्रसंग में यह कितनी केंद्रीय है। यह टेक अब तक श्लोक 57, 58, 61 और 68 में आ चुकी है। इस तरह यह विनाश की शृंखला को दोनों ओर से घेर लेती है। यहाँ इसका लौटना संकेत देता है कि व्यवहार के स्तर पर यह चित्रण पूरा हो गया है। श्लोक 69–72 इस ओर मुड़ते हैं कि यह अवस्था भीतर से कैसी होती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tasmād yasya mahābāhoतस्माद् यस्य महाबाहो
- इसलिए, हे महाबाहु, जिसकी (tasmāt + yasya + mahā-bāho)
- nigṛhītāni sarvaśaḥनिगृहीतानि सर्वशः
- पूरी तरह वश में की हुई हैं (nigṛhītāni + sarvaśaḥ)
- indriyāṇīndriyārthebhyasइन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्
- इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से (indriyāṇi + indriya-arthebhyaḥ)
- tasya prajñā pratiṣṭhitāतस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
- उसकी प्रज्ञा स्थिर है (tasya + prajñā + pratiṣṭhitā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The “therefore” here isn’t a fresh command — it’s a conclusion following from verses 60 and 67’s premises, argued rather than simply asserted: since partial control has already been shown unstable, restraint has to be complete. The logical form matters as much as the content; this verse is closing an argument, not opening a new one.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि आंशिक अनुशासन — अधिकांश चीज़ों पर संयम, सब पर नहीं — पहले भी आपके साथ बार-बार विफल रहा है, तो इस बार अलग परिणाम की आशा में वही आंशिक तरीका न दोहराएँ; इन श्लोकों में जो तर्क क्रमशः खड़ा किया गया है, उसका निष्कर्ष स्पष्ट रूप से यही है कि आंशिक नियंत्रण टिकता नहीं।
व्यावसायिक
- किसी टीम के मानक को असंगत ढंग से लागू करना प्रायः ठीक वहीं विफल होता है जहाँ अपवाद होता है, उसके बावजूद नहीं — यदि कोई सीमा बनाए रखने योग्य है, तो यहाँ प्रस्तुत तर्क उसे पूरी तरह बनाए रखने के पक्ष में है, अधिकांश रूप से नहीं।
परिवार और समाज
- घर का कोई नियम जो अधिकतर समय लागू होता है पर हमेशा नहीं, वह प्रायः ठीक अपवाद पर ही टूटता है, उसके बावजूद नहीं — नियम के पीछे के समग्र उद्देश्य से अधिक महत्त्व निरंतरता का है।
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