2.3

संस्कृत

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayy upapadyate kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa

अनुवाद

हे पार्थ, इस कायरता के वश में मत होओ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परन्तप, हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठ खड़े हो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

फटकार अब एक सीधे आदेश में बदल जाती है: उठो। “क्लैब्य” (जिसे यहाँ “नपुंसकता” कहा गया है) बहुत कठोर शब्द है — कृष्ण अर्जुन के टूट जाने को संवेदनशीलता नहीं, बल्कि पौरुषहीनता कह रहे हैं। अभी तक कोई दार्शनिक बात नहीं कही गई है; यह एक योद्धा है जिसे तर्क शुरू होने से पहले ही अपने आप में लौटने के लिए पुकारा जा रहा है।

“उत्तिष्ठ” — उठो — वही आज्ञा है जो गीता 2.37 पर परिणामों वाले तर्क को समाप्त करेगी और पूरी गीता में गूँजती रहेगी। गीता 2.4 पर अर्जुन का उत्तर इसे ठुकराना और अपना कारण बताना है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

klaibyaṃक्लैब्यं
नपुंसकता, कायरता
mā sma gamaḥमा स्म गमः
मत प्राप्त होओ (mā + sma + gamaḥ)
pārthaपार्थ
हे पार्थ
naitat tvayy upapadyateनैतत् त्वय्य् उपपद्यते
यह तुम्हें शोभा नहीं देता (na + etat + upapadyate)
kṣudraṃक्षुद्रं
तुच्छ, क्षुद्र
hṛdayadaurbalyaṃहृदयदौर्बल्यं
हृदय की दुर्बलता (hṛdaya-daurbalyam)
tyaktvottiṣṭhaत्यक्त्वोत्तिष्ठ
त्यागकर उठ खड़े होओ (tyaktvā + uttiṣṭha)
parantapaपरन्तप
हे परंतप

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Notice Krishna doesn’t reason with Arjuna here at all — he commands, and he commands by name: “Parantapa,” scorcher of foes, an epithet that reminds Arjuna who he already is rather than telling him who to become. The rebuke works by identity, not argument — it summons the self Arjuna has apparently forgotten, and only after that does the actual philosophy begin.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप अटक जाते हैं और एक ही चक्कर में घूमते रहते हैं, तो कभी-कभी आपको आगे बढ़ाने वाली चीज़ कोई नया तर्क नहीं होती, बल्कि यह याद दिलाना होता है कि आप पहले से कौन हैं और कौन रहे हैं। कर्म करने का कोई नया कारण खोजने से पहले स्वयं को अपनी ही पिछली उपलब्धियों की याद दिलाइए।

व्यावसायिक

  • जब कोई सक्षम साथी दबाव में जड़ हो जाता है, तो कभी-कभी आप जो सबसे उपयोगी बात कह सकते हैं, वह कोई नया तर्क नहीं होती, बल्कि उसकी अपनी पिछली उपलब्धियों की याद दिलाना होती है। उसे उसकी अपनी क्षमता से फिर से जोड़ना, आत्मविश्वास के पक्ष में कोई नया तर्क देने की तुलना में, उसे अधिक जल्दी कर्म की ओर ले जाता है।

परिवार और समाज

  • जब आपका कोई निकट का व्यक्ति आत्म-संदेह में फँसा हो, तो उसे बेहतर महसूस क्यों करना चाहिए, इसके लिए नया तर्क गढ़ने के बजाय उसे यह याद दिलाने का प्रयास करें कि वह पहले से कौन है और वह पहले क्या-क्या कर चुका है। तर्क से पहले पहचान किसी को आगे बढ़ा सकती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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