संस्कृत
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
āścaryavat paśyati kaścid enam āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥ āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇoti śrutvāpy enaṃ veda na caiva kaścit
अनुवाद
कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, वैसे ही कोई दूसरा इसके बारे में आश्चर्य की तरह बोलता है, और कोई अन्य इसके बारे में आश्चर्य की तरह सुनता है; पर सुनकर भी इसे कोई भी नहीं जानता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह एक दुर्लभ क्षण है, जब कृष्ण स्वयं अपनी शिक्षा की सरलता को कम कर देते हैं: कोई आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई उसके विषय में आश्चर्य की तरह बोलता है, कोई उसके विषय में आश्चर्य की तरह सुनता है — और फिर भी, “सुनकर भी कोई उसे सचमुच नहीं जानता।” यह एक ईमानदार स्वीकारोक्ति है कि श्लोक 16 से अब तक जो कुछ भी तर्क से कहा गया है, उसे कहना आसान है और सचमुच अनुभव करना कठिन। यह श्लोक 25 के “अचिन्त्य” का खंडन नहीं करता, बल्कि उसी की प्रतिध्वनि है। तीन बार आया आश्चर्यवत् — देखना, बोलना, सुनना, सब “आश्चर्य की तरह” — संप्रेषण की अवस्थाओं से मेल खाता है, और श्लोक कहता है कि यह कड़ी अपनी पूरी लंबाई तक चलकर भी जानना नहीं दे पाती। ठीक इसी अंतर को पाटने के लिए अध्याय 4 और 6 अभ्यास प्रस्तुत करते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- āścaryavat paśyati kaścid enamआश्चर्यवत् पश्यति कश्चिद् एनं
- कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है (āścaryavat + paśyati + kaścit + enam)
- āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥआश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः
- और वैसे ही कोई दूसरा इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है (āścaryavat + vadati + tathā + eva + ca + anyaḥ)
- āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇotiआश्चर्यवच् चैनं अन्यः शृणोति
- और कोई अन्य इसे आश्चर्य की तरह सुनता है (āścaryavat + ca + enam + anyaḥ + śṛṇoti)
- śrutvāpy enaṃ veda na caiva kaścitश्रुत्वाप्य् एनं वेद न चैव कश्चित्
- और सुनकर भी कोई इसे नहीं जानता (śrutvā + api + enam + veda + na + ca + eva + kaścit)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verse builds three rungs of engagement — seeing it as marvelous, speaking of it as marvelous, hearing of it as marvelous — and then drops all three at once: even having done all three, understanding still doesn’t follow. It’s a warning against mistaking engagement for comprehension; you can be fully attentive to a teaching, from every angle available to you, and still not have arrived at what it’s actually saying.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- कोई बात आपको कितनी गहराई से छूती है, इसे इस बात के बराबर न मान लें कि आप उसे कितनी अच्छी तरह समझते हैं — हो सकता है कि कोई विचार आपको सचमुच अद्भुत लगे, आप उस पर चर्चा करें और उसकी व्याख्या बार-बार सुनें, फिर भी आपने उसे वास्तव में समझा न हो। केवल अपनी रुचि को ही नहीं, अपनी समझ को भी बार-बार परखते रहिए।
व्यावसायिक
- डिज़ाइन की समीक्षा में किसी टीम के उत्साह या किसी आर्किटेक्चर पर उसकी धाराप्रवाह चर्चा को उसकी वास्तविक समझ न मान लें — यह मानने से पहले कि बात समझ में आ गई है, लोगों से कहें कि वे उसकी विफलता की स्थितियों को अपने शब्दों में समझाएँ।
परिवार और समाज
- यह न मान लें कि किसी ने कोई महत्वपूर्ण बातचीत केवल इसलिए समझ ली है कि उस समय वह उसमें ध्यान से शामिल था — बाद में फिर से पूछकर देखें, क्योंकि ध्यान देना और समझना एक ही बात नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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