2.31

संस्कृत

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥

svadharmam api cāvekṣya na vikampitum arhasi dharmyād dhi yuddhāc chreyo'nyat kṣatriyasya na vidyate

अनुवाद

अपने स्वधर्म को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी और कुछ नहीं है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

तात्त्विक तर्क प्रस्तुत कर लेने के बाद कृष्ण अर्जुन की ठोस स्थिति की ओर मुड़ते हैं: एक क्षत्रिय (योद्धा वर्ग का सदस्य) होने के नाते धर्मयुक्त युद्ध लड़ना उसका अपना कर्तव्य (स्वधर्म) है — और विशेष रूप से उसके लिए, इसे निभाने से बढ़कर कोई श्रेय नहीं है। यह एक संदर्भ-आधारित, भूमिका से बँधा तर्क है, सार्वभौमिक नहीं: गीता अन्यत्र स्पष्ट कहती है कि स्वधर्म स्थिति के अनुसार भिन्न होता है, और इस श्लोक में कृष्ण अर्जुन से उसका अपना ढाँचा छोड़ने को कहने के बजाय उसी ढाँचे के भीतर उससे संवाद करते हैं। विशेषण धर्म्यात् — “धर्मयुक्त”, न्यायसंगत — इस तर्क का आधार है: दावा यह नहीं है कि युद्ध अच्छा है, बल्कि यह कि यह युद्ध, जो पहले से ही न्यायसंगत है और छिड़ चुका है, क्षत्रिय का उचित कर्मक्षेत्र है। अध्याय 18 इसी सिद्धांत को उसके सबसे व्यापक रूप में गीता 18.47 में दोहराता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

svadharmamस्वधर्मं
अपने स्वधर्म को
api cāvekṣyaअपि चावेक्ष्य
और देखकर भी (api + ca + avekṣya)
na vikampitum arhasiन विकंपितुं अर्हसि
तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए (na + vikampitum + arhasi)
dharmyād dhi yuddhācधर्ंयाद् धि युद्धाच्
क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से (dharmyāt + hi + yuddhāt)
chreyo'nyatछ्रेयोऽन्यत्
बढ़कर कल्याणकारी दूसरा कुछ (śreyaḥ + anyat)
kṣatriyasyaक्षत्रियस्य
क्षत्रिय के लिए
na vidyateन विद्यते
नहीं है (na + vidyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse is easy to misread as a general endorsement of righteous war; it isn’t one. The claim is scoped tightly to “a Kshattriya” — a role, not a universal principle — and everything that follows in verses 32-38 argues from inside that same scoped role rather than from some claim about violence being good in the abstract. The specificity is the whole point: the argument would not transfer to someone in a different role facing a different duty.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी कठिन निर्णय को अपने सामने सही ठहराते हैं, तो जाँचिए कि वह औचित्य वास्तव में आपकी भूमिका और परिस्थितियों पर ही लागू होता है, या आप किसी ऐसे सार्वभौमिक सिद्धांत का सहारा ले रहे हैं जो यहाँ सचमुच लागू नहीं होता। जो कारण केवल इसलिए सही बैठता है कि आप विशेष रूप से वही हैं जो आप हैं, वह भी एक वैध कारण ही है।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी सहकर्मी को इस आधार पर सलाह दें कि आपके लिए क्या कारगर रहा, तो स्पष्ट बताइए कि कौन-सी बातें सामान्य थीं और कौन-सी आपकी विशेष भूमिका या पड़ाव से जुड़ी थीं — जो सलाह चुपचाप किसी सार्वभौमिक सिद्धांत को मान लेती है, जबकि वह वास्तव में भूमिका से बँधी थी, वह किसी भिन्न स्थिति वाले व्यक्ति को भटका देगी।

परिवार और समाज

  • जब आप परिवार के सदस्यों को बताएँ कि उन्हें क्या "करना चाहिए", और उसका आधार यही हो कि आपके लिए क्या सही था, तो ईमानदारी से स्वीकार कीजिए कि आपका तर्क शायद आपकी विशेष परिस्थितियों तक ही सीमित हो — आपकी स्थिति में जो आपका कर्तव्य था, वह किसी भिन्न स्थिति में अपने-आप उनका कर्तव्य नहीं बन जाता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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