संस्कृत
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt
अनुवाद
इसमें आरम्भ किए गए प्रयास का नाश नहीं होता, और न ही कोई विपरीत फल होता है। इस धर्म का थोड़ा-सा अंश भी महान भय से रक्षा करता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अभी घोषित किए गए मार्ग की एक व्यावहारिक खूबी: कर्मकाण्डी अनुष्ठान गलत ढंग से किए जा सकते हैं या अधूरे छूट सकते हैं, पर उनके विपरीत यहाँ कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता — इस अनुशासन की थोड़ी-सी मात्रा भी रक्षा करती है। यह उस विस्तृत कर्मकाण्ड-व्यवस्था से जानबूझकर किया गया विरोधाभास है, जिसमें चूक की आशंका बनी रहती है और जिसकी आलोचना कृष्ण श्लोक 42–44 में करने वाले हैं। प्रत्यवाय — किसी वैदिक अनुष्ठान को बिगाड़ देने से लगने वाले दोष का पारिभाषिक शब्द — ठीक वही चिंता है जिसके बारे में कृष्ण कहते हैं कि यह मार्ग उसे दूर कर देता है: इसे आंशिक रूप से करने का कोई गलत तरीका नहीं है। यही दावा भक्ति के लिए गीता 9.30–गीता 9.31 में दोहराया गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- nehābhikramanāśo'stiनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति
- यहाँ प्रयास का नाश नहीं होता (na + iha + abhikrama-nāśaḥ + asti)
- pratyavāyo na vidyateप्रत्यवायो न विद्यते
- विपरीत फल नहीं होता (pratyavāyaḥ + na + vidyate)
- svalpam apy asya dharmasyaस्वल्पं अप्य् अस्य धर्मस्य
- इस धर्म का थोड़ा-सा भी (svalpam + api + asya + dharmasya)
- trāyateत्रायते
- रक्षा करता है
- mahato bhayātमहतो भयात्
- महान भय से (mahataḥ + bhayāt)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna answers an objection Arjuna hasn’t voiced yet — the fear that trying and falling short would be worse than not trying. Addressing that unspoken hesitation before it surfaces suggests Krishna reads the real obstacle correctly: it isn’t that Arjuna disagrees with the teaching, it’s that he’s afraid of doing it imperfectly, and this verse is aimed squarely at removing that fear.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप कोई काम इसलिए शुरू करने से बच रहे हों कि आपको डर है कि वह अधूरा या गलत हो जाएगा, तो याद रखें कि सही दिशा में किया गया आंशिक, ईमानदार प्रयास शायद ही कभी व्यर्थ जाता है — अधूरे ढंग से करने का डर अक्सर स्वयं काम से बड़ी बाधा होता है।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम किसी नई कार्यप्रणाली को अपनाने में इस डर से हिचकिचाए कि शुरुआत में उससे गलती होगी, तो स्पष्ट कर दें कि आंशिक, धीरे-धीरे अपनाने का भी मूल्य है — अपूर्णता का डर दूर करना अक्सर अधिक दस्तावेज़ों की तुलना में कहीं ज़्यादा रुकावटें हटा देता है।
परिवार और समाज
- जब किसी व्यक्ति को आप किसी स्वस्थ आदत की ओर प्रेरित कर रहे हों और वह इस डर से हिचकिचाए कि वह उसमें असफल हो जाएगा, तो उसे साफ़ शब्दों में बताएँ कि एक छोटी, अधूरी शुरुआत भी मायने रखती है — यह आश्वासन कभी-कभी उसे करने के निर्देशों से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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