संस्कृत
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
gurūn ahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyam apīha loke hatvārthakāmāṃs tu gurūn ihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān
अनुवाद
महानुभाव गुरुजनों को मारने के बजाय इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी निश्चय ही अधिक अच्छा है। पर अर्थ और काम के इच्छुक गुरुजनों को मारकर तो मैं यहीं रक्त से सने भोगों को भोगूँगा।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन अपने गुरुजनों को मारने के बजाय भिखारी बनकर जीना पसंद करेगा, चाहे बदले में राज्य ही क्यों न मिले। यह चित्र जान-बूझकर झकझोर देने वाला है — “रक्त से सने भोग” — और यह वह भावनात्मक दाँव तय करता है जिसका सामना अध्याय के बाकी दार्शनिक तर्क को सचमुच करना है, केवल तर्क में उसे पछाड़ देना काफ़ी नहीं।
वह जिस शब्द का सहारा लेता है, वह है श्रेयस् — “बेहतर”, यानी वह शुभ जो केवल प्रिय लगने वाले से भिन्न है — यही शब्द गीता दो विकल्पों में से ऊँचे विकल्प के लिए बार-बार प्रयोग करती है (यह गीता 2.7 और गीता 3.35 में फिर आता है)। अर्जुन शुभ के संदर्भ में सोचने से इनकार नहीं कर रहा; उसने बस उसका हिसाब कृष्ण से उलटी दिशा में लगाया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- gurūnगुरून्
- गुरुजनों को
- ahatvāअहत्वा
- न मारकर
- hiहि
- निश्चय ही
- mahānubhāvānमहानुभावान्
- महान, आदरणीय
- śreyoश्रेयो
- श्रेष्ठ, बेहतर
- bhoktuṃभोक्तुं
- खाना, भोगना
- bhaikṣyamभैक्ष्यं
- भिक्षा का अन्न
- apīha lokeअपीह लोके
- इस लोक में भी (api + iha + loke)
- hatvārthakāmāṃsहत्वार्थकामांस्
- अर्थ और काम के इच्छुकों को मारकर (hatvā + artha-kāmān)
- tuतु
- परन्तु
- gurūnगुरून्
- गुरुजनों को
- ihaivaइहैव
- यहीं (iha + eva)
- bhuñjīyaभुञ्जीय
- मैं भोगूँगा
- bhogānभोगान्
- भोगों को
- rudhirapradigdhānरुधिरप्रदिग्धान्
- रक्त से सने हुए (rudhira-pradigdhān)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Blood-besprinkled feasts” is not a philosopher’s objection, it’s a visceral image chosen to make the stakes unignorable. Arjuna isn’t just disagreeing with a course of action — he’s setting a bar for what any answer will have to clear: not merely logically sound, but capable of standing up next to that image without flinching. The rest of the chapter has to earn its way past this line, not around it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी बात पर सिद्धांत के आधार पर आपत्ति करें, तो अपनी आपत्ति के पीछे की सजीव, ठोस छवि को भी शब्दों में कहने का प्रयास करें — एक स्पष्ट, ठोस चित्र उस उत्तर को ईमानदार बनाए रखता है जिसे आप अंततः स्वीकार करते हैं, बजाय इसके कि कोई केवल तर्क असली दाँव को अनदेखा करके निकल जाए।
व्यावसायिक
- जब आप किसी निर्णय का विरोध करें, तो केवल अमूर्त जोखिम ही नहीं, बल्कि सबसे बुरे ठोस परिणाम को भी स्पष्ट रूप से सबके सामने रखें — एक सजीव, ठोस उदाहरण अंतिम औचित्य को ईमानदार बनाए रखता है, बजाय इसके कि तकनीकी रूप से सही कोई तर्क चुपचाप असली कीमत से आगे निकल जाए।
परिवार और समाज
- जब आपका कोई करीबी कोई ऐसा निर्णय ले रहा हो जिससे आप परेशान हैं, तो केवल सामान्य आपत्ति ही नहीं, बल्कि जो बात आपको चिंतित करती है उसका ठोस, सजीव रूप भी कहें — इससे जो भी तय होता है, वह इस बारे में ईमानदार रहता है कि वास्तव में दाँव पर क्या है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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