संस्कृत
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥
atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam tathāpi tvaṃ mahābāho nainaṃ śocitum arhasi
अनुवाद
और यदि तुम इसे नित्य जन्म लेने वाला और नित्य मरने वाला मानते हो, तब भी, हे महाबाहो, तुम्हें इसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ एक उल्लेखनीय मोड़ आता है: कई श्लोकों में आत्मा की अमरता को एक तथ्य के रूप में स्थापित करने के बाद, कृष्ण अब एक वैकल्पिक तर्क रखते हैं, जो इस बात पर निर्भर नहीं करता कि अर्जुन उसमें से कुछ भी स्वीकार करें। यदि आप आत्मा को ऐसी चीज़ मानते हैं जो बार-बार जन्म लेती और मरती है — वह साधारण, गैर-तकनीकी दृष्टि जो अधिकतर लोग रखते हैं — तब भी केवल इसी कारण शोक करने की ज़रूरत नहीं है। यह पहले तर्क के नीचे रखा गया एक दूसरा, स्वतंत्र तर्क है, पहले तर्क को वापस लेना नहीं। इस तरह विकल्प के रूप में तर्क करना — “और यदि आप मेरी मूल बात को अस्वीकार भी कर दें…” — बहस की एक पहचानी हुई चाल है, और यह संकेत देती है कि कृष्ण को अर्जुन को किसी विशेष तत्त्वमीमांसा का क़ायल बनाने से अधिक इस बात की चिंता है कि अर्जुन कर्म करें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- atha cainaṃअथ चैनं
- और यदि इसे (atha + ca + enam)
- nityajātaṃनित्यजातं
- नित्य जन्म लेने वाला (nitya-jātam)
- nityaṃ vā manyase mṛtamनित्यं वा मन्यसे मृतं
- या नित्य मरने वाला मानते हो (nityam + vā + manyase + mṛtam)
- tathāpiतथापि
- तब भी (tathā + api)
- tvaṃत्वं
- तुम
- mahābāhoमहाबाहो
- हे महाबाहु
- nainaṃ śocitum arhasiनैनं शोचितुं अर्हसि
- इसके लिए शोक करना तुम्हें उचित नहीं (na + enam + śocitum + arhasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice what Krishna does here: he offers an argument that doesn’t need Arjuna to agree with the argument he just made. Most teachers double down when a claim isn’t landing; Krishna instead builds a second bridge under the first one, reaching the same conclusion from ground Arjuna might actually already stand on — the conclusion matters more to him than which route gets Arjuna there.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब कोई आपके तर्क से सहमत न हो, तो एक दूसरा तर्क गढ़ने का प्रयास करें जो उसी निष्कर्ष तक पहुँचे, पर उस आधार से शुरू हो जिसे वह व्यक्ति पहले से मानता है — किसी को मनाने के लिए आधार-वाक्यों पर सहमति ज़रूरी नहीं, केवल इस बात पर सहमति ज़रूरी है कि तर्क को अंत में कहाँ पहुँचना है।
व्यावसायिक
- जब आप किसी निर्णय का प्रस्ताव ऐसे हितधारकों के सामने रखें जो आपकी तकनीकी मान्यताओं से सहमत नहीं हैं, तो तर्क की एक दूसरी धारा तैयार रखें जो उन्हीं की प्रारंभिक मान्यताओं से शुरू होकर उसी सिफ़ारिश तक पहुँचे — आपके निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए उन्हें व्यवस्था के बारे में आपका मॉडल स्वीकार करना ज़रूरी नहीं है।
परिवार और समाज
- यदि आपका कोई निकट व्यक्ति किसी सीमा या किसी चुनाव के पीछे के आपके तर्क को स्वीकार नहीं करता, तो वही तर्क और ज़ोर से दोहराने के बजाय उसे समझाने का कोई दूसरा तरीका खोजें, जो उसकी अपनी पहले से बनी मान्यताओं से शुरू हो।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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