2.45

संस्कृत

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥

traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān

अनुवाद

हे अर्जुन, वेदों का विषय तीनों गुण हैं; तुम तीनों गुणों से परे हो जाओ, द्वन्द्वों से मुक्त, सदा सत्त्व में स्थित, पाने और सँजोने की चिन्ता से रहित और आत्मवान बनो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

इस प्रसंग में पहली बार कृष्ण का अपना उपदेश सीधे शब्दों में कहा गया है: उन तीनों गुणों से पूरी तरह ऊपर उठो, जिनके भीतर वैदिक कर्मकाण्ड की पूरी व्यवस्था चलती है — सुख और दुःख जैसे द्वंद्वों से परे, पाने की चिंता से मुक्त, आत्मा में स्थित। यह श्लोक 42–44 में बताई गई कर्मकाण्डियों की दशा का सकारात्मक प्रतिरूप है, और ठीक अगले श्लोक में आने वाली जलाशय और बाढ़ की उपमा के लिए भूमि तैयार करता है। योगक्षेम — “प्राप्ति और संरक्षण”, यानी पाने और सँभालकर रखने का पूरा हिसाब-किताब — वही है जिसे यह उपदेश रद्द करता है; आत्मवान्, “आत्मा में स्थित”, वह है जिसे यह उसकी जगह स्थापित करता है। यहाँ प्रसंगवश नामित तीन गुण अध्याय 14 का पूरा विषय बन जाते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

traiguṇyaviṣayā vedāत्रैगुण्यविषया वेदा
वेद तीनों गुणों के विषयों से सम्बन्धित हैं (traiguṇya-viṣayāḥ + vedāḥ)
nistraiguṇyoनिस्त्रैगुण्यो
तीनों गुणों से रहित (nis-traiguṇyaḥ)
bhavārjunaभवार्जुन
हो जाओ, हे अर्जुन (bhava + arjuna)
nirdvandvoनिर्द्वन्द्वो
द्वन्द्वों से परे (nir-dvandvaḥ)
nityasattvasthoनित्यसत्त्वस्थो
सदा सत्त्व में स्थित (nitya-sattva-sthaḥ)
niryogakṣemaनिर्योगक्षेम
अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा की चिन्ता से रहित (nir-yoga-kṣemaḥ)
ātmavānआत्मवान्
आत्मा में स्थित (ātma-vān)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse stops arguing and starts describing — four qualities stacked in a single line with no supporting reason attached to any of them. After a whole passage built on justification (why ritualism fails, why single-pointedness matters), Krishna simply states what the alternative state looks like, as though the case has already been made and what’s needed now is a target to aim at, not another reason to aim at it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप स्वयं को यह विश्वास दिला चुके हों कि कोई बदलाव क्यों करने योग्य है, तो उस पर बार-बार बहस करना बंद करें और इसके बजाय ठोस रूप से लिखें कि उसके बाद की स्थिति कैसी दिखेगी — उस मोड़ पर एक और औचित्य की तुलना में एक स्पष्ट लक्ष्य अधिक उपयोगी होता है।

व्यावसायिक

  • जब कोई टीम इस पर सहमत हो जाए कि बदलाव क्यों ज़रूरी है, तो बातचीत को औचित्य से हटाकर लक्ष्य-स्थिति के ठोस वर्णन की ओर ले जाएँ — रोज़मर्रा के काम में "अच्छा" वास्तव में कैसा दिखता है — क्योंकि उस मोड़ के बाद "क्यों" के पक्ष में और तर्क देना ज़्यादातर "क्या" को तय करने में देरी ही करता है।

परिवार और समाज

  • जब आप और कोई दूसरा व्यक्ति इस पर सहमत हो जाएँ कि आपके आपसी व्यवहार में कुछ क्यों बदलना चाहिए, तो बदलाव के पक्ष में तर्क गढ़ते रहने के बजाय अगली बातचीत इस वर्णन में लगाएँ कि बेहतर रूप व्यवहार में वास्तव में कैसा दिखता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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