2.8

संस्कृत

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥

na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yac chokam ucchoṣaṇam indriyāṇām avāpya bhūmāv asapatnam ṛddhaṃ rājyaṃ surāṇām api cādhipatyam

अनुवाद

यदि मैं पृथ्वी पर शत्रुहीन, समृद्ध राज्य और देवताओं का भी आधिपत्य पा लूँ, तब भी मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अर्जुन स्वयं अपने संकट की गहराई बताते हैं: पूरी पृथ्वी जीत लेना, या स्वयं देवताओं पर शासन करना भी, उस शोक को नहीं मिटा सकता जो इस समय उन्हें भीतर से जला रहा है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह समस्या स्वयं को किस प्रकार की समस्या के रूप में सामने रखती है — कोई रणनीतिक या राजनीतिक समस्या नहीं, जिसे जीतकर सुलझाया जा सके, बल्कि कुछ ऐसा, जिसके बारे में अर्जुन को पहले से ही आभास है कि उसे केवल समझ में आया परिवर्तन ही छू सकता है। “उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम्” — ऐसा शोक जो इन्द्रियों को सुखा देता है — निराशा का शारीरिक वर्णन है, कोई मनोदशा नहीं। हर बाहरी पुरस्कार को उपाय के रूप में नकारकर, अर्जुन ने अनजाने में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि किस प्रकार का उत्तर मान्य होगा: वही, जिसे कृष्ण गीता 2.11 से देना आरम्भ करते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na hi prapaśyāmiन हि प्रपश्यामि
क्योंकि मैं नहीं देखता (na + hi + prapaśyāmi)
mamāpanudyādममापनुद्याद्
[जो] मेरे … को दूर कर सके (mama + apanudyāt)
yac chokamयच् छोकं
जो शोक (yat + śokam)
ucchoṣaṇam indriyāṇāmउच्छोषणं इन्द्रियाणां
इन्द्रियों को सुखा देने वाला (ucchoṣaṇam + indriyāṇām)
avāpyaअवाप्य
पाकर
bhūmāvभूमाव्
पृथ्वी पर
asapatnamअसपत्नं
शत्रुरहित, निष्कण्टक
ṛddhaṃऋद्धं
समृद्ध
rājyaṃराज्यं
राज्य
surāṇāmसुराणां
देवताओं का
apiअपि
भी
cādhipatyamचाधिपत्यं
और आधिपत्य (ca + ādhipatyam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Arjuna doesn’t realize it yet, but this verse is a correct diagnosis, not just a complaint. By ruling out even total earthly and divine sovereignty as a cure, he’s already conceding that his problem isn’t strategic or material — it’s a problem of understanding. Krishna doesn’t have to argue Arjuna out of thinking a better outcome would fix this; Arjuna has already argued himself out of it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब कोई भी बाहरी जीत सचमुच उस बात को हल न कर सके जो आपको परेशान कर रही है, तो इसे एक जानकारी के रूप में गंभीरता से लें — इसका अर्थ प्रायः यह होता है कि समस्या परिस्थिति के स्तर पर नहीं, बल्कि समझ या अर्थ के स्तर पर है, और कोई भी उपलब्धि वहाँ तक नहीं पहुँचेगी।

व्यावसायिक

  • यदि पदोन्नति, वेतन-वृद्धि या बड़ा दायरा भी सचमुच उस बात को हल न करे जो किसी भूमिका को लेकर आपको भीतर ही भीतर खा रही है, तो अगली बाहरी जीत को समाधान मानकर उसके पीछे भागते न रहें — असली समस्या को पहचानकर उसका नाम लें, क्योंकि उसी तरह की और सफलता उसे छू भी नहीं पाएगी।

परिवार और समाज

  • यदि आप देखें कि कोई भी परिणाम जो आप जुटा सकते हैं — घर बदलना, बड़ा मकान, अधिक पैसा — किसी रिश्ते में जो कुछ अस्थिर है, उसे सचमुच स्थिर नहीं करेगा, तो उस संकेत पर भरोसा करें: वह आपको बता रहा है कि समस्या परिस्थितियों की नहीं है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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