2.7

संस्कृत

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ yac chreyaḥ syān niścitaṃ brūhi tan me śiṣyas te'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam

अनुवाद

दीनता के दोष से मेरा स्वभाव आहत हो गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त भ्रमित है, इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ: मेरे लिए जो अधिक हितकर हो, वह मुझे निश्चित रूप से बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ; आपकी शरण में आए हुए मुझको शिक्षा दीजिए।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

पूरे आरंभिक भाग का निर्णायक मोड़। अर्जुन तर्क करना छोड़ देता है और सिखाए जाने की याचना करता है: “मैं आपका शिष्य हूँ; मुझे उपदेश दीजिए, क्योंकि मैंने आपकी शरण ली है।” यह एक पंक्ति पूरे संवाद का स्वर बदल देती है — अपनी आपत्तियाँ गिनाते एक योद्धा से, गुरु से सच्चा प्रश्न पूछते एक शिष्य तक — और श्लोक 11 से आगे जो कुछ भी है, वह सब इसी का कृष्ण द्वारा दिया गया उत्तर है।

अपनी स्थिति के लिए वह जिस शब्द का प्रयोग करता है, वह है धर्मसम्मूढ — क्या उचित है, इस विषय में पूरी तरह भ्रमित — और वह जो कदम उठाता है, वह है प्रपत्ति, अर्थात् शरण लेना। ये दोनों मिलकर वह पूर्वशर्त बनाते हैं जिसे गीता उपदेश के फलित होने के लिए आवश्यक मानती है: न जानने की ईमानदार स्वीकृति, और साथ ही उसके प्रति श्रद्धा जो संभवतः जानता हो।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥकार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
दीनता के दोष से आहत स्वभाव वाला (kārpaṇya-doṣa-upahata-svabhāvaḥ)
pṛcchāmiपृच्छामि
मैं पूछता हूँ
tvāṃत्वां
आपसे
dharmasammūḍhacetāḥधर्मसंमूढचेताः
धर्म के विषय में भ्रमित चित्त वाला (dharma-sammūḍha-cetāḥ)
yac chreyaḥ syān niścitaṃयच् छ्रेयः स्यान् निश्चितं
जो निश्चित रूप से श्रेयस्कर हो (yat + śreyaḥ + syāt + niścitam)
brūhiब्रूहि
बताइए
tan meतन् मे
वह मुझे (tat + me)
śiṣyasशिष्यस्
शिष्य हूँ (śiṣyaḥ)
te'haṃतेऽहं
मैं आपका (te + aham)
śādhiशाधि
शिक्षा दीजिए
māṃमां
मुझे
tvāṃत्वां
आपकी
prapannamप्रपन्नं
शरण में आए हुए

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

One word changes the entire scene: “śiṣyas te’ham” — I am your disciple. Up to this verse Arjuna has been arguing as an equal, objection against objection; this line converts the relationship itself, and everything Krishna says from verse 11 onward is instruction to a student, not persuasion of a peer. The content of the teaching hasn’t started yet, but the terms it will be received under have already changed.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपना पक्ष रखने और सचमुच सिखाए जाने की विनती करने के अंतर पर ध्यान दें — दूसरे में यह स्वीकार करना पड़ता है कि आपके पास पहले से उत्तर नहीं है, और इसे खुलकर कहना एक और आपत्ति उठाने की तुलना में कठिन भी है और अधिक उपयोगी भी।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी मार्गदर्शक या वरिष्ठ सहकर्मी के साथ किसी बहस में अटक जाएँ, तो देखें कि क्या अधिक सार्थक कदम यह होगा कि आप अपनी स्थिति का बचाव करना बंद करें और इसके बजाय स्पष्ट रूप से सिखाए जाने का अनुरोध करें — बात को इस तरह रखने का यह बदलाव अक्सर आपको एक अलग और अधिक उपयोगी तरह का उत्तर दिलाता है।

परिवार और समाज

  • यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ बार-बार दोहराई जाने वाली बहस में फँसे हैं जिसकी समझ पर आप सचमुच भरोसा करते हैं, तो उनकी बात का खंडन करने के बजाय स्पष्ट रूप से उनसे कहिए कि वे बस आपको अपना दृष्टिकोण सिखाएँ — बहस से सच्चे प्रश्न की ओर यह बदलाव इस बात को बदल देता है कि वे आपको क्या दे पाते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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