2.32

संस्कृत

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥

yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāram apāvṛtam sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddham īdṛśam

अनुवाद

हे पार्थ, अपने-आप सामने आया हुआ और स्वर्ग के खुले द्वार जैसा ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

कृष्ण स्वयं युद्ध को एक नए रूप में प्रस्तुत करते हैं: एक क्षत्रिय के लिए, जो धर्मयुद्ध बिना माँगे आ पड़े — न भड़काया गया हो, न रचा गया हो — वह बोझ नहीं, बल्कि एक दुर्लभ अवसर है। इसी से अगले कई श्लोकों का तर्क विरोध के सहारे खड़ा होता है: इतने अच्छे अवसर को ठुकराने की भी अपनी कीमत होती है, और श्लोक 33–36 एक-एक करके यही बताते हैं। यदृच्छया — “संयोग से”, बिना बुलाए — यही इस श्लोक की धुरी है: जो युद्ध स्वयं रचा जाए, वह नैतिक दृष्टि से उस युद्ध से भिन्न वस्तु है जो पहले से ही न्यायपूर्ण होकर किसी के द्वार पर आ पहुँचे। कृष्ण का दावा है कि अर्जुन का युद्ध दूसरी तरह का है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yadṛcchayāयदृच्छया
अपने-आप, बिना माँगे
copapannaṃचोपपन्नं
और प्राप्त हुआ (ca + upapannam)
svargadvāramस्वर्गद्वारं
स्वर्ग का द्वार (svarga-dvāram)
apāvṛtamअपावृतं
खुला हुआ
sukhinaḥसुखिनः
भाग्यशाली
kṣatriyāḥक्षत्रियाः
क्षत्रिय
pārthaपार्थ
हे पार्थ
labhanteलभन्ते
पाते हैं
yuddham īdṛśamयुद्धं ईदृशं
ऐसा युद्ध (yuddham + īdṛśam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

Krishna doesn’t stop at making the positive case; verse 32 is the “upside” half of a two-part persuasion, and verses 33-36 immediately supply the “downside” half — what’s lost by refusing. Stating a genuine opportunity and its foregone cost as two separate arguments, rather than folding them into one, is a deliberate strategy: some people move on hope, others on loss-aversion, and Krishna isn’t willing to bet on which one will land for Arjuna.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप स्वयं को किसी कठिन किंतु सही निर्णय के लिए मनाने का प्रयास कर रहे हों, तो दोनों पक्ष स्पष्ट रूप से सामने रखें — उसे चुनने से आपको क्या मिलता है, और अलग से, उसे न चुनने से आप क्या खोते हैं। केवल एक ही दृष्टिकोण पर निर्भर रहना शायद आपको आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त न हो।

व्यावसायिक

  • जब किसी दुविधा में पड़ी टीम के सामने कोई बदलाव प्रस्तुत करें, तो लाभ वाले पक्ष और कुछ न करने की कीमत वाले पक्ष को आपस में मिलाने के बजाय दो अलग-अलग तर्कों के रूप में रखें — अलग-अलग लोग अवसर के रूप में रखी गई बात और हानि के रूप में रखी गई बात पर अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया देते हैं, और आप नहीं जानते कि कौन-सी बात असर करेगी।

परिवार और समाज

  • जब आप अपने किसी निकट व्यक्ति को ऐसे निर्णय के लिए मना रहे हों जो उसके हित में है, तो उसके सामने दोनों बातें दो अलग-अलग बिंदुओं के रूप में रखें — उसे क्या मिल सकता है, और कदम न उठाने पर वह क्या खो सकता है — यह मानकर न चलें कि एक ही दृष्टिकोण पर्याप्त होगा।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    ← 2.31अध्याय 2 · 72 में से 322.33 →