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संस्कृत

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

yatato hy api kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, प्रयत्न करते हुए विवेकी पुरुष के मन को भी ये उत्तेजित इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह सीधे अर्जुन को दी गई एक स्पष्ट चेतावनी है: सच्ची समझ वाला व्यक्ति भी, सक्रिय रूप से प्रयास करते हुए, अपने मन को उत्तेजित इन्द्रियों द्वारा बलपूर्वक खींचे जाते हुए पा सकता है। यह निराशा का कारण उतना नहीं है, जितना आगे आने वाली बात का औचित्य — श्लोक 61 का ठोस अनुशासन, और श्लोक 62–63 की चेतावनी भरी शृंखला, जो ठीक-ठीक दिखाती है कि यदि इसे रोका न जाए तो यह खिंचाव कैसे घटित होता है।

यह स्वीकारोक्ति जान-बूझकर की गई है: यततः अपि, “प्रयास करने वाले का भी,” और विपश्चितः, “विवेकी का।” प्रयास और अंतर्दृष्टि अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं, इसीलिए अगला श्लोक एक आधार जोड़ता है — मन को इन्द्रियों से ऊँची किसी वस्तु पर टिकाना।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yatato hy apiयततो ह्य् अपि
क्योंकि यत्न करने वाले के भी (yatataḥ + hi + api)
kaunteyaकौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
puruṣasya vipaścitaḥपुरुषस्य विपश्चितः
विवेकी पुरुष के (puruṣasya + vipaścitaḥ)
indriyāṇi pramāthīniइन्द्रियाणि प्रमाथीनि
मथ डालने वाली इन्द्रियाँ (indriyāṇi + pramāthīni)
harantiहरन्ति
हर लेती हैं
prasabhaṃप्रसभं
बलपूर्वक
manaḥमनः
मन को

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

After several verses building up the accomplished sage’s portrait, this one interrupts with a warning aimed straight at Arjuna: competence itself grants no immunity — even a wise, actively striving person can be dragged off course. The verse’s real work is puncturing any complacency the preceding description might have earned.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • आत्म-संयम को ऐसी अवस्था न मानें जिसे आपने एक बार पा लिया और अब जिसकी देखभाल छोड़ सकते हैं — इस श्लोक का पूरा आशय यही है कि सच्ची कुशलता और सक्रिय प्रयत्न भी किसी क्षण विशेष में मार्ग से बहा ले जाए जाने से सुरक्षा नहीं देते।

व्यावसायिक

  • वरिष्ठ लोग भी वास्तविक दबाव में अहंकार या जल्दबाज़ी से अचानक चूक जाते हैं — विशेषज्ञता सुरक्षा नहीं देती, इसलिए केवल इस भरोसे पर न रहें कि आत्मविश्वास तनाव में टिका रहेगा, बल्कि व्यवस्था में ही सुरक्षा-उपाय और आदतें बनाइए।

परिवार और समाज

  • जो व्यक्ति आम तौर पर टकराव को अच्छी तरह संभाल लेता है, वह भी किसी एक भावनाओं से भरे क्षण में बह सकता है — यह मानकर न चलें कि आपकी सामान्य स्थिरता अपने आप सामने आ जाएगी, बल्कि ऐसे क्षणों के लिए पहले से सुरक्षा-उपाय बनाइए।

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