संस्कृत
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayate'rjuna prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī
अनुवाद
परन्तु हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य आसक्ति के कारण फल की इच्छा रखते हुए धर्म, काम और अर्थ को दृढ़ता से थामे रहता है, हे पार्थ, वह धृति राजसी है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
राजसिक धृति आसक्ति और फल की लालसा के कारण धर्म, काम और अर्थ को कसकर पकड़े रहती है — जो जीवन के चार शास्त्रीय पुरुषार्थों में से तीन हैं। इसमें एक तीखी विडंबना है: उचित लक्ष्यों (कर्तव्य, कामना, धन) को थामे रहना भी उसी क्षण राजसिक हो जाता है जब वह पकड़ फल से प्रेरित हो, जिसका अर्थ है कि यहाँ व्यक्ति किस चीज़ के पीछे है, इसका महत्त्व इससे कम है कि वह उसके पीछे किस भाव से है। राजसिक धृति धर्म-काम-अर्थ — कर्तव्य, सुख, धन — को दृढ़ता से पकड़ती है, पर प्रसङ्गेन, यानी आसक्ति के साथ, और फलाकाङ्क्षी होकर, यानी प्रतिफल चाहते हुए। यह लालसा की सेवा में लगी दृढ़ता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yayā tu dharmakāmārthānयया तु धर्मकामार्थान्
- किंतु जिससे धर्म, काम और अर्थ को (yayā + tu + dharma-kāma-arthān)
- dhṛtyā dhārayate'rjunaधृत्या धारयतेऽर्जुन
- हे अर्जुन, जिस धृति से धारण किए रहता है (dhṛtyā + dhārayate + arjuna)
- prasaṅgena phalākāṅkṣīप्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी
- आसक्ति से फल की आकांक्षा करने वाला (prasaṅgena + phala-ākāṅkṣī)
- dhṛtiḥ sā pārtha rājasīधृतिः सा पार्थ राजसी
- हे पार्थ, वह धृति राजसी है (dhṛtiḥ + sā + pārtha + rājasī)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The three goals named here, dharma, kama, artha, are exactly the three of the four classical aims of life that can be craved. The fourth, moksha, is conspicuously missing, and that isn’t an oversight: liberation is the one aim that can’t coherently be gripped with craving, since craving is precisely what it is freedom from. The list’s gap is doing as much teaching as its content.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि योग्य लक्ष्य भी उसी क्षण राजसिक हो जाते हैं जब आप उन्हें उनके अपने मूल्य के लिए साधने के बजाय उनसे मिलने वाले लाभ के लिए जकड़ लेते हैं — इस जाल से बचा रहने वाला एकमात्र लक्ष्य वही है जिसकी परिभाषा ही लालसा का अभाव है।
व्यावसायिक
- कंपनी का कोई वैध उद्देश्य — राजस्व, मूल्यों से जुड़ी कोई पहल — उसी क्षण राजसिक हो जाता है जब नेतृत्व उसे केवल उससे निकलने वाले आँकड़े के लिए जकड़ लेता है; केवल यह न देखें कि लक्ष्य अपने आप में पाने योग्य था या नहीं, बल्कि उसके पीछे लगने के ढंग की गुणवत्ता पर भी नज़र रखें।
परिवार और समाज
- परिवार का कोई अच्छा लक्ष्य भी — कोई पड़ाव, कोई अवसर — जब उसके अपने लिए नहीं बल्कि उससे मिलने वाले लाभ के लिए साधा जाता है, तो वह आनंद के बजाय बेचैन जकड़ का कारण बन जाता है — केवल यह न देखें कि लक्ष्य चाहने योग्य था या नहीं, बल्कि उस जकड़ पर नज़र रखें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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