18.65

संस्कृत

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṃ namaskuru mām evaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo'si me

अनुवाद

अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरे लिए यज्ञ करो और मुझे नमस्कार करो। ऐसा करके तुम मुझे ही प्राप्त होगे। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

चार छोटी आज्ञाओं में एक भक्तिपरक सूत्र — अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरे लिए यज्ञ करो, मुझे प्रणाम करो। इसका समापन एक असामान्य व्यक्तिगत वचन से होता है: “मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, तुम मुझे प्रिय हो।” यह श्लोक 66वें श्लोक तक ले जाने वाला प्रवेश-मार्ग है। इसका स्वर कोमल है, पर इसकी संरचना ठीक वैसी ही है: कृष्ण की ओर पूर्ण उन्मुखता। ठीक अगली पंक्ति में इसी को व्यापक बनाकर इस ग्रंथ की सबसे दूरगामी आज्ञा का रूप दिया जाने वाला है। मन्मना भव मद्भक्तो… — यह गीता 9.34 का चार भागों वाला निर्देश है, जो गीता के लगभग अंतिम वचन के रूप में शब्दशः लौटता है। अब इस पर सत्यं ते प्रतिजाने, “मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ”, और प्रियोऽसि मे, “तुम मुझे प्रिय हो”, की मुहर लगी है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

man-manā bhava mad-bhaktoमन्-मना भव मद्-भक्तो
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो (mat-manāḥ + bhava + mat-bhaktaḥ)
mad-yājī māṃ namaskuruमद्-याजी मां नमस्कुरु
मेरा यजन करो, मुझे नमस्कार करो (mat-yājī + mām + namaskuru)
mām evaiṣyasi satyaṃ teमां एवैष्यसि सत्यं ते
तुम मुझे ही प्राप्त होगे, यह मैं तुमसे सत्य (mām + eva + eṣyasi + satyam + te)
pratijāne priyo'si meप्रतिजाने प्रियोऽसि मे
प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, तुम मुझे प्रिय हो (pratijāne + priyaḥ + asi + me)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The four instructions alternate register: mind (interior), devotion (interior disposition), sacrifice (external act), prostration (physical act) — then the verse closes back on the interior, a personal pledge. The sequence isn’t asking for inner feeling instead of outer practice or the reverse; it moves between them deliberately, treating the two as one continuous motion rather than as competing options.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने भीतर के दृढ़ विश्वास और अपने बाहरी अभ्यास को ऐसे विकल्प न मानें जिनमें एक दूसरे की जगह ले लेता है — सच्चा बदलाव इन दोनों के बीच चलता है: भीतर की भावना बाहरी कर्म को आकार देती है, और बाहरी कर्म बदले में उस भावना को और गहरा करता है।

व्यावसायिक

  • किसी टीम को किसी बदलाव में विश्वास करने और उसके नए व्यवहारों का वास्तव में अभ्यास करने के बीच चुनाव न करने दें — दोनों की माँग करें, विश्वास और कर्म के बीच आते-जाते रहें, क्योंकि इनमें से कोई एक अकेले शायद ही कभी वह परिणाम देता है जो आप चाहते हैं।

परिवार और समाज

  • किसी रिश्ते में प्रेम को केवल एक निजी भावना या केवल कर्तव्य-भाव से किए गए कामों का एक समूह बनकर न रहने दें — दोनों को एक-दूसरे को पोषित करने दें, उसी तरह जैसे यह श्लोक किसी एक को चुनने के बजाय भीतर की भक्ति और बाहरी भाव-प्रदर्शन के बीच आता-जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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