संस्कृत
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati samaḥ sarveṣu bhūteṣu mad-bhaktiṃ labhate parām
अनुवाद
ब्रह्मभूत होकर, प्रसन्न आत्मा वाला वह न शोक करता है, न कोई कामना करता है। सभी प्राणियों के प्रति समभाव रखते हुए वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यही वह मोड़ है जिसकी ओर पूरा क्रम बढ़ रहा था: ब्रह्म बन जाना (ब्रह्मभूत) किसी निर्वैयक्तिक विलय में समाप्त नहीं होता, बल्कि सीधे “मेरी परम भक्ति” (मद्भक्तिं लभते पराम्) में खुल जाता है। अध्याय 11 पहले ही दिखा चुका है कि जहाँ ज्ञान, यज्ञ और तप, तीनों अर्जुन को कृष्ण का सच्चा दर्शन कराने में विफल रहे, वहाँ भक्ति सफल हुई (11.53-54); यह श्लोक वही बात दूसरी दिशा से कहता है और दिखाता है कि ज्ञान-मार्ग का शिखर, ब्रह्म-साक्षात्कार भी, भक्ति से अलग नहीं खड़ा रहता, बल्कि उसी में परिणत हो जाता है। पूरे अध्याय का धुरी-बिंदु: ब्रह्मभूतः — ब्रह्म बन चुका — व्यक्ति तब “मेरी परम भक्ति पाता है।” निर्वैयक्तिक परम तत्त्व का साक्षात्कार अंत नहीं है; वही सच्ची भक्ति को संभव बनाता है। गीता 18.55 इस क्रम को पूरा करता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- brahma-bhūtaḥ prasannātmāब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा
- ब्रह्मभूत, प्रसन्न चित्त वाला (brahma-bhūtaḥ + prasanna-ātmā)
- na śocati na kāṅkṣatiन शोचति न काङ्क्षति
- न शोक करता है, न कामना करता है (na + śocati + na + kāṅkṣati)
- samaḥ sarveṣu bhūteṣuसमः सर्वेषु भूतेषु
- सभी प्राणियों के प्रति समभाव वाला (samaḥ + sarveṣu + bhūteṣu)
- mad-bhaktiṃ labhate parāmमद्-भक्तिं लभते परां
- मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है (mat-bhaktim + labhate + parām)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The qualities listed here — serene, free of grief and craving, the same toward all beings — read like a finish line for the entire path this chapter has been building. The verse then treats that finish line as a threshold instead: the state doesn’t stand on its own, it opens directly into “supreme devotion unto Me.” What looks like the ceiling of one discipline turns out, in the very same line, to be the floor of another.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप अंततः उस शांत, अहंकार-मुक्त अवस्था तक पहुँच जाएँ जिसके लिए आप प्रयास करते रहे हैं, तो उसे अंतिम पड़ाव न मानें — देखें कि वह अब क्या संभव बनाती है जो पहले उपलब्ध नहीं था, और पहुँच जाने के संतोष में रुकने के बजाय उस स्थिरता का उपयोग उसी के लिए करें।
व्यावसायिक
- जब आप या आपकी टीम अंततः किसी क्षेत्र में वास्तविक तकनीकी महारत हासिल कर ले, तो परियोजना को पूरा घोषित करने से बचें — महारत आमतौर पर वह दहलीज़ होती है जो अधिक मूल्यवान सहयोगी कार्य को संभव बनाती है, स्वयं लक्ष्य नहीं।
परिवार और समाज
- जब आप अंततः किसी प्रियजन के साथ कम प्रतिक्रियाशील हो जाएँ, तो उस संयम को ही उपलब्धि न मानें — यही वह चीज़ है जो अंततः उनके साथ सच्ची निकटता संभव बनाती है, इसलिए शांत बने रहने पर रुक जाने के बजाय इसका उपयोग उनकी ओर बढ़ने के लिए करें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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