18.17

संस्कृत

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥

yasya nāhaṅkṛto bhāvo buddhir yasya na lipyate hatvāpi sa imāḻ lokān na hanti na nibadhyate

अनुवाद

जिसका भाव अहंकार से रहित है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन लोकों को मारकर भी न तो मारता है और न ही बँधता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

इसका निष्कर्ष वह प्रसिद्ध पंक्ति है: जो अहंकार से मुक्त है और जिसकी बुद्धि मलिन नहीं हुई, वह मारते हुए भी वास्तव में न मारता है, न बँधता है। यह हिंसा की छूट कम और श्लोक 16 का तार्किक परिणाम अधिक है — यदि अलग की हुई आत्मा आरंभ से ही कभी कर्ता थी ही नहीं, तो अहंकार-रहित बुद्धि से किया गया कर्म उस आत्मा को बंधन में नहीं डाल सकता। ठीक यही तर्क कृष्ण ने अध्याय 2 में दिया था, जब वे यह सिद्ध कर रहे थे कि अर्जुन को युद्ध करना ही चाहिए। यह अध्याय की सबसे तीखी पंक्ति है, और गीता 2.19–गीता 2.21 की ओर सीधी वापसी भी: जिसका भाव अहंकार से बना नहीं है (न अहंकृतो भावः), वह “मारता है और बँधता नहीं।” युद्धभूमि की पूरी समस्या का उत्तर “मैंने किया” के अभाव में मिल जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yasya nāhaṅkṛto bhāvoयस्य नाहङ्कृतो भावो
जिसका भाव अहंकार से युक्त नहीं है (yasya + na + ahaṅkṛtaḥ + bhāvaḥ)
buddhir yasya na lipyateबुद्धिः यस्य न लिप्यते
जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती (buddhiḥ + yasya + na + lipyate)
hatvāpi sa imāḻ lokānहत्वापि स इमांल् लोकान्
वह इन लोकों को मारकर भी (hatvā + api + saḥ + imān + lokān)
na hanti na nibadhyateन हन्ति न निबध्यते
न मारता है, न बँधता है (na + hanti + na + nibadhyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Read on its own, this verse is almost dangerous — “though he slay, he slayeth not” can sound like a license for anyone convinced of their own detachment. But the claim only holds up as the logical conclusion of verse 16’s premise, that the true Self was never actually the doer of anything; strip that premise away and what’s left is a slogan anyone could borrow to excuse harm. The paradox is only safe to state after the argument that earns it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • इस श्लोक के निष्कर्ष को उधार लेकर — 'मैंने यह आसक्ति के बिना किया, इसलिए यह मेरे विरुद्ध नहीं गिना जाएगा' — किसी को चोट पहुँचाने को उचित ठहराने से सावधान रहें, जब तक कि आपने अहंकार से मुक्ति का वह गहरा काम सचमुच न किया हो जिस पर यह दावा टिका है। यह नारा तभी ईमानदार है जब उसका सार वास्तविक हो चुका हो, उससे पहले नहीं।

व्यावसायिक

  • इस पर नज़र रखें कि कहीं 'मैं तो बस प्रक्रिया का पालन कर रहा था, यह व्यक्तिगत नहीं था' का इस्तेमाल किसी हानिकारक निर्णय को उचित ठहराने के लिए तो नहीं हो रहा, जबकि वह वास्तविक अनासक्ति या परवाह मौजूद ही नहीं जो इसे सच बनाती। अनासक्ति को बचाव के रूप में प्रस्तुत करना तभी उचित है जब उसके मूल में अहंकार-रहित इरादा वास्तविक हो, न कि जवाबदेही से बचने का कोई छोटा रास्ता।

परिवार और समाज

  • यदि अपने किसी करीबी से कोई चुभने वाली बात कहने के बाद आप कहते हैं 'मेरा मतलब व्यक्तिगत रूप से नहीं था', तो जाँचिए कि क्या यह सचमुच सच है या केवल एक सुविधाजनक बहाना — जो अनासक्ति आपमें वास्तव में थी ही नहीं, उसका दावा करने से उन शब्दों का असर मिट नहीं जाता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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