संस्कृत
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaś cāsmi tattvataḥ tato māṃ tattvato jñātvā viśate tad-anantaram
अनुवाद
भक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ; फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह तुरंत मुझमें प्रवेश कर जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अब भक्ति को वह श्रेय दिया जाता है जो केवल शुद्ध ज्ञान नहीं दे सका — कृष्ण को “तत्त्व से” (तत्त्वतः) जानना और, उसी आधार पर, परम में प्रवेश करना। भक्ति को साफ़-साफ़ परिभाषित करना उचित है, क्योंकि इस संग्रह में उसके लिए कोई अलग अवधारणा-पृष्ठ नहीं है: इसका अर्थ सामान्य श्रद्धा-भाव से अधिक विशिष्ट है — साकार कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण का भक्तिपूर्ण संबंध, जो ज्ञान की विश्लेषणात्मक आत्म-जिज्ञासा से और कर्म के अनुशासित, अनासक्त कर्म से भिन्न है, और जिसे यहाँ वह अंतिम द्वार घोषित किया गया है जिससे होकर ब्रह्म-ज्ञान को भी पूर्ण होने के लिए गुज़रना पड़ता है। भक्त्या माम् अभिजानाति… विशते तदनन्तरम् — “भक्ति से मनुष्य मुझे यथार्थ रूप में जानता है, और फिर [मुझमें] प्रवेश करता है।” यही दावा गीता 11.54 में है: भक्ति ही पूरी दूरी तक पहुँचाती है — ज्ञातुम्, द्रष्टुम्, प्रवेष्टुम्, जानना, देखना, प्रवेश करना।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- bhaktyā mām abhijānātiभक्त्या मां अभिजानाति
- भक्ति से वह मुझे भली-भाँति जान लेता है (bhaktyā + mām + abhijānāti)
- yāvān yaś cāsmi tattvataḥयावान् यश् चास्मि तत्त्वतः
- मैं जितना और जो हूँ, तत्त्व से (yāvān + yaḥ + ca + asmi + tattvataḥ)
- tato māṃ tattvato jñātvāततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा
- फिर मुझे तत्त्व से जानकर (tataḥ + mām + tattvataḥ + jñātvā)
- viśate tad-anantaramविशते तद्-अनन्तरं
- उसके तुरंत बाद [मुझमें] प्रवेश करता है (viśate + tat-anantaram)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Tattvatah — “in essence,” “in truth” — is usually the jnana path’s word, the vocabulary of analytical self-inquiry claiming to arrive at what’s real. This verse borrows that exact word and hands the achievement to bhakti instead. It isn’t proposing devotion as an alternative to real knowledge; it’s quietly redefining what counts as knowing something in essence — relationship, here, turns out to reach further than analysis alone.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि आप वर्षों से अपने बारे में किसी सत्य का अध्ययन करते आ रहे हैं और उससे कुछ भी नहीं बदला, तो सोचिए कि किसी बात को केवल शब्दों में जान लेना और उसे संबंध के माध्यम से जानना दो अलग-अलग उपलब्धियाँ हैं — जो केवल विश्लेषण से नहीं मिल पाता, वह कभी-कभी निरंतर भक्ति या जुड़ाव से मिल जाता है।
व्यावसायिक
- आप किसी सिस्टम का हर दस्तावेज़ पढ़ लें, फिर भी आप उसे उस तरह नहीं जान पाएँगे जैसे वह व्यक्ति जानता है जिसने किसी वास्तविक संकट के दबाव में उसे चलाया हो — सिस्टम के साथ प्रत्यक्ष, व्यावहारिक संबंध को एक अलग प्रकार का ज्ञान मानें, अध्ययन का कोई घटिया विकल्प नहीं।
परिवार और समाज
- आप अपने किसी निकट व्यक्ति के बारे में दशकों तक तथ्य जानते रह सकते हैं और फिर भी उसे सार रूप में न जानें — इस तरह का जानना संबंध पर ही निरंतर ध्यान देने से आता है, उसके बारे में और अधिक जानकारी जुटाने से नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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