संस्कृत
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
mac-cittaḥ sarva-durgāṇi mat-prasādāt tariṣyasi atha cet tvam ahaṅkārān na śroṣyasi vinaṅkṣyasi
अनुवाद
मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे। पर यदि अहंकार के कारण तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
एक ही साँस में एक वचन और एक चेतावनी दोनों आते हैं: कृष्ण का चिंतन करने से उनकी कृपा से हर बाधा पार हो जाती है, किंतु अहंकार के कारण न सुनना पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है। दाँव पर क्या है, यह कठोरता से कहा गया है, उन शर्तों के बिना जिनकी गुंजाइश पहले के दार्शनिक अध्यायों ने रखी थी — यह किसी निर्णय के लिए रची गई वक्तृता है, चिंतन के लिए रचा गया तर्क नहीं। दाँव पर क्या है, यह सीधे-सीधे कहा गया है: मत्प्रसादात् तरिष्यसि — “कृपा से तुम हर कठिन स्थान को पार कर जाओगे” — या फिर, अहंकारात्, अहंकार के कारण, यदि तुम सुनने से इनकार करो, तो विनङ्क्ष्यसि, “तुम नष्ट हो जाओगे।” चुनाव अर्जुन का है; गीता 18.63 यह चुनाव फिर से उन्हीं के हाथ में सौंप देता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mac-cittaḥ sarva-durgāṇiमच्-चित्तः सर्व-दुर्गाणि
- मुझमें चित्त लगाकर, सभी कठिनाइयों को (mat-cittaḥ + sarva-durgāṇi)
- mat-prasādāt tariṣyasiमत्-प्रसादात् तरिष्यसि
- मेरी कृपा से तुम पार कर जाओगे (mat-prasādāt + tariṣyasi)
- atha cet tvam ahaṅkārānअथ चेत् त्वं अहङ्कारान्
- किन्तु यदि तुम अहंकार के कारण (atha + cet + tvam + ahaṅkārāt)
- na śroṣyasi vinaṅkṣyasiन श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि
- नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे (na + śroṣyasi + vinaṅkṣyasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Everywhere else in this closing sequence — the ladder built in verses 70 and 71, the multiple paths named across the whole text — the Gita makes room for gradation. This verse doesn’t: it collapses the outcome to a single binary, listen or don’t, overcome every obstacle or be destroyed utterly. Placed next to a text this comfortable with nuance, the starkness itself is the signal that something urgent, not incremental, is being asked.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- आपका अधिकांश विकास धीरे-धीरे हो सकता है, पर उन दुर्लभ क्षणों को पहचानें जो सचमुच दो-टूक होते हैं — कि आप अपने बारे में किसी कठोर सत्य को अभी सुनते हैं या नहीं — और जिस निर्णय में कोई बीच का रास्ता ही नहीं है, उस पर थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ने वाली सोच न लगाएँ।
व्यावसायिक
- परिवर्तन का अधिकांश प्रबंधन क्रमिक और चरणबद्ध होना चाहिए, पर उन गिने-चुने क्षणों को पहचानें — सुरक्षा से जुड़ा कोई निर्णय, कोई ऐसा मोड़ जहाँ से लौटा न जा सके — जहाँ चुनाव सचमुच दो-टूक होता है, और केवल इसलिए उस बात की धार कम न करें कि दूसरी जगहों पर बारीकियों ने आपका साथ दिया।
परिवार और समाज
- अधिकांश असहमतियों में धैर्य और धीरे-धीरे आगे बढ़ना लाभ देता है, पर उस दुर्लभ बातचीत को पहचानें जिसमें चुनाव सचमुच दो-टूक होता है — अभी सुनें या अवसर खो दें — और उस क्षण को उन बारीकियों से कमज़ोर न करें जो बाकी समय आपके काम आती हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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