संस्कृत
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
yad agre cānubandhe ca sukhaṃ mohanam ātmanaḥ nidrālasyapramādotthaṃ tat tāmasam udāhṛtam
अनुवाद
जो सुख आरम्भ में भी और परिणाम में भी आत्मा को मोह में डालता है, और जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह सुख तामस कहा गया है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
तामसिक सुख में उबारने वाला कोई मोड़ होता ही नहीं — वह आरम्भ में भी मोह में डालता है और पूरे समय भी, और निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है। इसके साथ सुख का त्रिविध विश्लेषण ठीक वहीं समाप्त होता है जहाँ अध्याय 14 ने सत्त्व, रजस् और तमस् की गतियों को छोड़ा था: किसी व्यक्ति को जो सुखद लगता है, उसे ईमानदारी से परखा जाए तो वह इस बात के सबसे विश्वसनीय संकेतों में से एक सिद्ध होता है कि इस समय उस पर कौन-सा गुण शासन कर रहा है — एक ऐसा सूत्र जिसे यह अंतिम अध्याय अब ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और अंततः स्वयं आनंद तक कसकर खींच चुका है। तामसिक सुख “आरम्भ में भी और पूरे समय भी” मोह में डालता है — इसका कोई अच्छा चरण नहीं होता — और यह निद्रा, आलस्य, प्रमाद से आता है: नींद, सुस्ती, लापरवाही। सब कुछ बंद कर देने का संतोष। इसका गुण तमस् है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yad agre cānubandhe caयद् अग्रे चानुबन्धे च
- जो आरम्भ में और परिणाम में भी (yat + agre + ca + anubandhe + ca)
- sukhaṃ mohanam ātmanaḥसुखं मोहनं आत्मनः
- सुख आत्मा को मोहित करने वाला है (sukham + mohanam + ātmanaḥ)
- nidrālasyapramādotthaṃनिद्रालस्यप्रमादोत्थं
- निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न (nidrā-ālasya-pramāda-uttham)
- tat tāmasam udāhṛtamतत् तामसं उदाहृतं
- वह तामस कहा गया है (tat + tāmasam + udāhṛtam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Verses 37 and 38 built their whole distinction on a timeline, poison-then-nectar against nectar-then-poison. This verse doesn’t offer a third timeline; it says both at first and afterward, collapsing the very axis the prior two depended on. Tamasic pleasure isn’t a third point on the same arc as the other two — it’s what happens when there’s no arc to plot at all, just flat delusion from start to finish.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि कोई गतिविधि हर बार पहले, दौरान और बाद में एक जैसी खोखली लगती है, तो वह फीकापन अपने आप में ही निदान है, न कि पहले-विष-फिर-अमृत वाले उस ढर्रे का कोई हल्का रूप, जिसे आप शायद खोज रहे हों। कुछ आदतों में ऐसा कोई उतार-चढ़ाव होता ही नहीं जिसे परखना सार्थक हो।
व्यावसायिक
- जो प्रक्रिया न कभी सुधरती है और न कभी कुछ स्पष्ट करती है — न आरम्भ का कोई कष्ट जो बाद में सुलझ जाए, न आरम्भ की कोई सुविधा जिसकी कीमत आपको बाद में चुकानी पड़े — वह किसी कठिन-पर-सार्थक पहल से भी अलग समस्या है और किसी लुभावनी-पर-महँगी पहल से भी। किसी उतार-चढ़ाव के प्रकट होने की प्रतीक्षा करने के बजाय उसे पहचानिए और उसे काट दीजिए।
परिवार और समाज
- किसी रिश्ते में जो ढर्रा हर बातचीत के आरम्भ, मध्य और अन्त में एक-सा खाली लगता है, वह कोई धीरे-धीरे सुलगने वाली समस्या नहीं है जिस पर किसी मोड़ के लिए नज़र रखते रहें — वह आपको पहले ही वह सब बता चुका है जो वह बताने वाला है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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