संस्कृत
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
duḥkham ity eva yat karma kāyakleśabhayāt tyajet sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet
अनुवाद
जो मनुष्य कर्म को केवल 'यह दुःखदायी है' ऐसा मानकर शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग का फल बिल्कुल नहीं पाता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
बीच की स्थिति: शारीरिक कष्ट के डर से कर्म को त्याग देना, उसे “दुःखदायी” कहकर छोड़ देना, राजसिक है। बाहर से ऐसा व्यक्ति सात्त्विक त्याग करने वाले जैसा ही दिख सकता है, क्योंकि दोनों ही कर्म करना बंद कर देते हैं। पर इसका प्रेरक कारण स्पष्टता नहीं, आत्म-रक्षा है। कृष्ण साफ़ कहते हैं कि इससे कोई फल नहीं मिलता: राजसिक त्याग करने वाले को “त्याग का फल” बिल्कुल “नहीं मिलता”। राजसिक त्याग: काम छोड़ देना क्योंकि वह कठिन है — काय-क्लेश-भय, यानी शरीर को होने वाले कष्ट का डर। यह भी आसक्ति का ही एक रूप है (सुख-सुविधा के प्रति), इसलिए न त्यागफलं लभेत्, इससे त्याग का कोई भी फल नहीं मिलता।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- duḥkham ity eva yat karmaदुःखं इत्य् एव यत् कर्म
- जो कर्म, केवल 'यह दुःखदायी है' ऐसा मानकर (duḥkham + iti + eva + yat + karma)
- kāyakleśabhayāt tyajetकायक्लेशभयात् त्यजेत्
- शारीरिक कष्ट के भय से छोड़ देता है (kāya-kleśa-bhayāt + tyajet)
- sa kṛtvā rājasaṃस कृत्वा राजसं
- वह ऐसा राजस त्याग करके (saḥ + kṛtvā + rājasam + tyāgam)
- tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhetत्यागं नैव त्यागफलं लभेत्
- त्याग का फल बिल्कुल नहीं पाता (na + eva + tyāga-phalam + labhet)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verse specifies exactly how the rajasic quitter explains himself — by saying, out loud or to himself, “this is painful.” The sattvic actor in verse 9 offers no commentary on how the work feels at all, only that it ought to be done; the tell, this text suggests, isn’t whether a task feels hard, it’s whether you’re narrating the hardship as your reason for stopping.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप कुछ छोड़ने वाले हों और खुद को यह कहकर उसे समझाते सुनें कि 'यह कष्टदायक है', तो उसी शब्द-चयन पर ठहरें — अक्सर असली कारण वही बोल रहा होता है, कठिनाई नहीं। कोई काम कठिन हो सकता है, फिर भी उसे करते रहना गलत नहीं होता।
व्यावसायिक
- इस पर ध्यान दें कि कहीं टीम के सदस्य किसी कठिन काम को छोड़ने को यह बताकर तो उचित नहीं ठहरा रहे कि वह कितना कष्टदायक या थकाने वाला लगता है, बजाय इसके कि वे दायरे या प्राथमिकता में किसी वास्तविक बदलाव का हवाला दें — अक्सर यह बखान ही बताए गए कारण से अधिक सच्चा संकेत होता है।
परिवार और समाज
- यदि आप स्वयं को परिवार के साथ कोई ज़रूरी कठिन बातचीत टालते हुए पाएँ, क्योंकि आप बार-बार यही सोच रहे हैं कि वह कितनी कष्टदायक होगी, तो ध्यान दें कि यही सोचते रहना निर्णय ले रहा है — असहजता को नाम दे देने का अर्थ यह नहीं कि वह बातचीत करनी ही नहीं चाहिए।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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