संस्कृत
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
cetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ buddhi-yogam upāśritya mac-cittaḥ satataṃ bhava
अनुवाद
मन से सभी कर्मों को मुझमें संन्यस्त करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम निरन्तर मुझमें चित्त लगाए रहो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ से आदेशों का एक सीधा क्रम आरंभ होता है — मन से सभी कर्म कृष्ण को अर्पित कर दें, कृष्ण को ही परम लक्ष्य मानें, बुद्धियोग (विवेकशील बुद्धि का योग, जिसका नाम अध्याय 2 में आया था) का आश्रय लें, और मन को निरंतर कृष्ण में ही लगाए रखें। इसके बाद आने वाले चार श्लोक, 57 से 60 तक, कृष्ण की अंतिम और सबसे निजी पुकार का काम करते हैं, जिनमें आदर्श भक्त के वर्णन से हटकर सीधे अर्जुन को ही संबोधित किया गया है। गीता 3.30 और गीता 12.6 फिर लौट आते हैं: चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य — मन से सारे कर्म कृष्ण को समर्पित कर दें, बुद्धियोग की शरण लें, और मन को मुझमें लगाए रखें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- cetasā sarva-karmāṇiचेतसा सर्व-कर्माणि
- मन से सभी कर्मों को (cetasā + sarva-karmāṇi)
- mayi sannyasya mat-paraḥमयि संन्यस्य मत्-परः
- मुझमें अर्पित करके, मेरे परायण होकर (mayi + sannyasya + mat-paraḥ)
- buddhi-yogam upāśrityaबुद्धि-योगं उपाश्रित्य
- बुद्धियोग का आश्रय लेकर (buddhi-yogam + upāśritya)
- mac-cittaḥ satataṃ bhavaमच्-चित्तः सततं भव
- निरंतर मुझमें चित्त लगाए रहो (mat-cittaḥ + satatam + bhava)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice what’s absent here: no new argument, no fresh justification, just four practices — mental renunciation, orientation, buddhi-yoga, sustained fixation — stacked back to back in a single breath. Eighteen chapters of reasoning have already been spent; this line reads like someone who has finished making the case and is now simply telling you what to do with it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी महत्वपूर्ण बात पर सचमुच अपने मन को विश्वास दिला चुके हों, तो उस पर बार-बार बहस करना छोड़ दें और उन ठोस अभ्यासों की सूची बनाना शुरू करें जो उसे रोज़मर्रा के जीवन में साकार करते हैं — तर्क का एक ठहराव-बिंदु होता है, और उसके आगे केवल अमल ही बचता है।
व्यावसायिक
- जब कोई रणनीतिक तर्क आपकी टीम के मन में सचमुच बैठ जाए, तो हर बैठक में उसे फिर से सही ठहराने से बचें — बातचीत को उन ठोस अभ्यासों की ओर ले जाएँ जो उसे व्यवहार में उतारते हैं, जैसे यह श्लोक सीधे निर्देश पर आ जाता है।
परिवार और समाज
- जब आप और आपका कोई करीबी सचमुच इस पर सहमत हो जाएँ कि क्या बदलना है, तो तर्क को बार-बार दोहराना छोड़ दें और उन विशिष्ट दैनिक आदतों को तय करना शुरू करें जो उसे पूरा करती हैं — सहमति बन जाने के बाद तर्क को दोहराना केवल अभ्यास को टालता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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