संस्कृत
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
saṃnyāsasya mahābāho tattvam icchāmi veditum tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthak keśiniṣūdana
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग, दोनों का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन अंतिम प्रवचन की शुरुआत कृष्ण से ऐसे दो शब्दों में भेद करने का अनुरोध करके करते हैं, जिनका अब तक लगभग एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग होता आया है — संन्यास (परित्याग) और त्याग (छोड़ना)। इससे संकेत मिलता है कि अध्याय 3 से 6 तक “त्यागने” शब्द के ढीले, काव्यात्मक प्रयोग ने एक वास्तविक वैचारिक अंतर को ढक दिया था, जिसे वे उपदेश समाप्त होने से पहले दूर कर लेना चाहते हैं। चीज़ों को छोड़ने के विषय में पूछते हुए कृष्ण को हृषीकेश, अर्थात् “इन्द्रियों के स्वामी”, कहकर संबोधित करना एक सोचा-समझा संकेत है: जो इन्द्रियों पर शासन करता है, उसी से पूछा जा रहा है कि मनुष्य कर्म करने की इच्छा पर शासन कैसे करे। यह पूरे काव्य में अर्जुन का अंतिम प्रश्न भी है; यहाँ से श्लोक 78 तक जो कुछ भी है, वह शब्दों की सटीकता के इसी एक अनुरोध का उत्तर है। अर्जुन का अंतिम प्रश्न इस काव्य के सबसे लंबे अध्याय को आरंभ करता है: क्या संन्यास (परित्याग) और त्याग (छोड़ना) दो अलग बातें हैं या एक? कृष्ण का उत्तर दोनों को एक कर देता है — दोनों का अर्थ है फल की पकड़ छोड़ना, कर्म को नहीं — और फिर यह अध्याय एक-एक पद लेकर पूरी शिक्षा पर फिर से दृष्टि डालता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- saṃnyāsasya mahābāhoसंन्यासस्य महाबाहो
- हे महाबाहो, संन्यास का (saṃnyāsasya + mahā-bāho)
- tattvam icchāmi veditumतत्त्वं इच्छामि वेदितुं
- मैं तत्त्व जानना चाहता हूँ (tattvam + icchāmi + veditum)
- tyāgasya ca hṛṣīkeśaत्यागस्य च हृषीकेश
- और हे हृषीकेश, त्याग का (tyāgasya + ca + hṛṣīkeśa)
- pṛthak keśiniṣūdanaपृथक् केशिनिषूदन
- अलग-अलग, हे केशिनिषूदन (pṛthak + keśi-niṣūdana)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
That this is the last question Arjuna asks in the entire poem is easy to miss on a first read, but it reframes everything that follows: for seventeen chapters the text has taught through dialogue, and from this line forward it teaches through one uninterrupted answer. Arjuna choosing to end the back-and-forth with a request for definitional precision — not a moral dilemma, not a plea, just “tell these two words apart” — suggests that by this point his real confusion isn’t about what to do but about what the vocabulary he’s already been given even means.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
This is a familiar moment outside any battlefield: someone facing a real transition — leaving a role, ending a long commitment — who isn’t stuck on what to decide but on what the people advising them actually mean by “let it go” or “step back,” because those phrases get used for at least two different moves. Arjuna asking for the distinction before acting, rather than guessing and hoping the difference doesn’t matter, is the more disciplined version of a question most people skip past under pressure to just decide something.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपको लगे कि जिन दो शब्दों को आप एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल करते आए हैं, उनके अर्थ शायद अलग-अलग हों, तो आगे कुछ भी करने से पहले रुकिए और उनका अंतर पूछिए — अर्जुन के अंतिम प्रश्न की तरह, असली उलझन कभी-कभी इस बारे में नहीं होती कि क्या करना है, बल्कि शब्दों के अर्थ को लेकर होती है।
व्यावसायिक
- यदि कोई नेतृत्वकर्ता दो शब्दों — जैसे 'प्राथमिकता देना' और 'ज़िम्मेदारी लेना' — का प्रयोग ऐसे करे मानो उनका अर्थ एक ही हो, तो प्रतिबद्ध होने से पहले उनसे दोनों का अंतर स्पष्ट करने को कहें; काम के बीच में यह अंतर पता चलना, शुरू में ही पूछ लेने की तुलना में कहीं अधिक महँगा पड़ता है।
परिवार और समाज
- जब परिवार का कोई सदस्य कहे 'इसे छोड़ दो' और आपको पक्का न हो कि उनका मतलब इसे पूरी तरह बंद कर देना है या केवल किसी विशेष परिणाम की अपेक्षा छोड़ देना, तो हामी भरने से पहले पूछ लें कि उनका आशय कौन-सा है — ये दोनों एक जैसी प्रतिबद्धता नहीं हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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