संस्कृत
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥
saṃnyāsas tu mahābāho duḥkham āptum ayogataḥ yogayukto munir brahma na cireṇādhigacchati
अनुवाद
किन्तु हे महाबाहु, योग के बिना संन्यास पाना कठिन है; योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यही वह शर्त है जिससे श्लोक 2 का क्रम समझ में आता है: संन्यास और योग एक ही स्थान तक ले जा सकते हैं, पर योग के अनुशासन के बिना संन्यास का टिक पाना कठिन है, जबकि योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त होता है। यहाँ “योग” संन्यास का विरोधी नहीं है — यह उसे वास्तव में प्राप्त करने का व्यावहारिक साधन है। यह मूलतः वही तर्क है जो गीता की पहले की शिक्षा में अन्यत्र पूर्ण निष्क्रियता के बारे में दिया गया है, जिसे यहाँ संन्यास बनाम योग की विशिष्ट शब्दावली में फिर से कहा गया है। अयोगतः — “योग के बिना” — यही निर्णायक शब्द है: जिस कोरे संन्यास के पीछे कोई अभ्यास नहीं होता, वह ढहकर फिर गीता 3.6 वाले पाखंड में बदल जाता है। योग ही त्याग को केवल दिखावा न रहने देकर वास्तविक बनाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- saṃnyāsas tu mahābāhoसंन्यासस् तु महाबाहो
- परन्तु हे महाबाहु, संन्यास (saṃnyāsaḥ + tu + mahā-bāho)
- duḥkham āptum ayogataḥदुःखं आप्तुं अयोगतः
- योग के बिना पाना कठिन है (duḥkham + āptum + ayogataḥ)
- yogayukto munir brahmaयोगयुक्तो मुनिः ब्रह्म
- योगयुक्त मुनि ब्रह्म को (yoga-yuktaḥ + muniḥ + brahma)
- na cireṇādhigacchatiन चिरेणाधिगच्छति
- शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है (na + cireṇa + adhigacchati)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Having just spent two verses (4-5) collapsing any real difference between renunciation and yoga, Krishna turns around in this one and reintroduces a difference — but a practical one, about difficulty of execution, not a metaphysical one about destination. The chapter’s argument isn’t a straight line; it keeps unifying and re-differentiating the same two things depending on whether the question at hand is where they end up or how hard they are to actually sustain.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी लक्ष्य तक पहुँचने के दो तरीके सिद्धांत रूप में बराबर सही हो सकते हैं, फिर भी उन्हें लगातार निभाना कितना कठिन है, इसमें वे बहुत अलग हो सकते हैं — "सिद्धांत में तो दोनों ठीक हैं" वाली बात के कारण उस तरीके को चुनने में न झिझकें जिसे आप सच में निभाते रह सकते हैं।
व्यावसायिक
- जब दो तकनीकी तरीके कागज़ पर दोनों ही ज़रूरतें पूरी करते हों, तो उन्हें चलाने की कठिनाई को एक वास्तविक और अलग पैमाने के रूप में तौलें — परिणाम में बराबर होना और चलाने में बराबर व्यावहारिक होना दो अलग दावे हैं, और इन्हें एक मान लेने का अर्थ है बिना किसी कारण कठिन रास्ता चुन लेना।
परिवार और समाज
- जब आप और आपके साथी किसी बात को सँभालने के दो उचित तरीकों पर बहस करें, तो याद रखें कि सिद्धांत रूप में बराबर सही होने का अर्थ यह नहीं कि वे ख़ास तौर पर आप दोनों के लिए बराबर टिकाऊ हैं — चुनने से पहले पूछें कि आप वास्तव में किसे निभाते रह सकते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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