5.3

संस्कृत

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhāt pramucyate

अनुवाद

हे महाबाहु, जो न द्वेष करता है और न कामना करता है, उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए; क्योंकि द्वन्द्वों से मुक्त मनुष्य सहज ही बन्धन से छूट जाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

कर्मयोग की श्रेष्ठता के पक्ष में तर्क देने से पहले, कृष्ण “संन्यासी” की नई परिभाषा देते हैं, ताकि इसका अर्थ अब वह व्यक्ति न रहे जिसने शारीरिक रूप से कर्म करना बंद कर दिया है। सच्चे नित्य संन्यासी की पहचान राग और द्वेष से — यानी द्वंद्वों (द्वन्द्व) से — मुक्ति है, जो बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक स्थिति है। यही नई परिभाषा कृष्ण के अगले दो श्लोकों को यह कहने का आधार देती है कि संन्यास और योग एक ही हैं: यदि संन्यास का अर्थ केवल अनासक्ति है, तो आसक्ति के बिना कर्म करने वाला कर्मयोगी पहले से ही संन्यासी है। नित्य-संन्यासी — “सदा त्याग करने वाला”, एक बार और दिखाई देने वाले ढंग से नहीं — संन्यास को एक कृत्य से हटाकर एक स्थायी मनोवृत्ति में स्थापित करता है। गीता 6.1 भी यही करता है: सच्चा संन्यासी वह है जो फल पर निर्भर हुए बिना कर्म करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsīज्ञेयः स नित्यसंन्यासी
उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए (jñeyaḥ + saḥ + nitya-saṃnyāsī)
yo na dveṣṭi na kāṅkṣatiयो न द्वेष्टि न काङ्क्षति
जो न द्वेष करता है, न आकांक्षा करता है (yaḥ + na + dveṣṭi + na + kāṅkṣati)
nirdvandvo hi mahābāhoनिर्द्वन्द्वो हि महाबाहो
क्योंकि हे महाबाहु, द्वन्द्वों से रहित (nir-dvandvaḥ + hi + mahā-bāho)
sukhaṃ bandhāt pramucyateसुखं बन्धात् प्रमुच्यते
सहज ही बन्धन से मुक्त हो जाता है (sukham + bandhāt + pramucyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Krishna doesn’t announce that he’s redefining “renunciate” — he simply uses the word to mean freedom from attraction and aversion and lets the new sense do its work silently across the next two verses. Anyone still holding the old, literal meaning — someone who has physically stopped acting — will find verses 4-5’s claim that renunciation and yoga are the same thing simply doesn’t parse. The argument is smuggled in through a definition change introduced by usage, never flagged as a change at all.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

The verse’s real test isn’t renunciation of grand things — a career, a home — but freedom from dveṣa and kāṅkṣā, aversion and craving, in the small reactive moments nobody is watching: the interruption, the traffic, the minor slight. Nirdvandva, free from the pairs of opposites, is measured there or nowhere, since large renunciations can be performed for an audience while small reactivity happens when no one’s grading you. A person who has given up everything visible but still flinches at every minor irritant hasn’t met this definition at all.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि कब आपने चुपचाप अपने लिए किसी शब्द — सफलता, अनुशासन, विश्राम — की परिभाषा बदल दी है, और यह भी नहीं देखा कि उसका अर्थ खिसक गया है; बिना जाँची गई नई परिभाषा अपने साथ एक पूरा तर्क ले आती है, जिससे आप कभी सचेत रूप से सहमत नहीं हुए।

व्यावसायिक

  • जब किसी सहकर्मी का तर्क अचानक पूरी तरह अकाट्य लगने लगे, तो जाँचें कि कहीं बीच में किसी मुख्य शब्द का अर्थ तो नहीं बदल गया — बिना बताए बदली गई परिभाषा अक्सर कहे गए तर्क से ज़्यादा काम कर रही होती है।

परिवार और समाज

  • यदि किसी करीबी व्यक्ति के साथ बार-बार होने वाली असहमति कभी सचमुच सुलझती ही नहीं, तो जाँचें कि कहीं आप दोनों किसी मुख्य शब्द — सम्मान, मदद, न्याय — को चुपचाप अलग-अलग अर्थ में तो नहीं बरत रहे; हो सकता है असहमति परिभाषा की हो, विषय-वस्तु की नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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