5.15

संस्कृत

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥

nādatte kasyacit pāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ

अनुवाद

सर्वव्यापी प्रभु न किसी का पाप ग्रहण करता है और न किसी का पुण्य। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, उसी से सब प्राणी मोहित होते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

पिछले श्लोक से सीधे आगे बढ़ते हुए, यह श्लोक बात का चक्र पूरा करता है: सर्वव्यापी आत्मा (विभु) न किसी का पाप ग्रहण करती है, न किसी का पुण्य, इसलिए कर्म का नैतिक अवशेष उसे वास्तव में कभी छूता ही नहीं। साधारण प्राणियों के मोह की व्याख्या नैतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक ढंग से की गई है — ज्ञान, यानी भीतर निहित बोध, आवृत है, ढका हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे बादल सूर्य के प्रकाश को नष्ट नहीं करते, बल्कि उसे धरती तक पहुँचने से रोक देते हैं। ढकने का यह रूपक सचमुच महत्त्वपूर्ण काम करता है: इसका आशय है कि सुधार कुछ नया पाने में नहीं, बल्कि एक बाधा हटाने में है, और ठीक यही सूर्य की वह उपमा है जिसका सहारा अगला श्लोक लेता है। यह प्रतिरूप घटाने का है: ज्ञान बनाया नहीं जाता, बल्कि उघाड़ा जाता है। इसीलिए गीता ज्ञान को अत्यंत कठिन भी कह सकती है और, दूसरे अर्थ में, पहले से विद्यमान भी — यह वही दावा है जो गीता 4.38 के “उसे अपने भीतर आत्मा में पा लेता है” में है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

nādatte kasyacit pāpaṃनादत्ते कस्यचित् पापं
किसी का पाप ग्रहण नहीं करता (na + ādatte + kasyacit + pāpam)
na caiva sukṛtaṃ vibhuḥन चैव सुकृतं विभुः
और न ही पुण्य, सर्वव्यापी प्रभु (na + ca + eva + sukṛtam + vibhuḥ)
ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃअज्ञानेनावृतं ज्ञानं
अज्ञान से ढका हुआ ज्ञान (ajñānena + āvṛtam + jñānam)
tena muhyanti jantavaḥतेन मुह्यन्ति जन्तवः
उसी से प्राणी मोहित होते हैं (tena + muhyanti + jantavaḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse quietly anticipates an objection it never states outright: if the Self takes on neither anyone’s sin nor their merit, why does guilt or pride feel so real to the people having them? The answer arrives in the same breath — delusion, not a genuine transaction with the Self, explains the felt weight of both. Rather than asserting the metaphysics and leaving the obvious counter-experience unaddressed, the verse quietly accounts for why that counter- experience exists at all.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब अपने किए किसी काम को लेकर आप पर भारी अपराध-बोध हावी हो या आपके मन में बढ़ा-चढ़ा गर्व हो, तो सोचिए कि उस भावना की तीव्रता शायद आपके वास्तविक नैतिक भार के बारे में कम और किसी ढकी हुई उलझन के बारे में अधिक बता रही हो — भावना के सच्चे होने का अर्थ यह नहीं कि आपके बारे में उसकी कहानी भी सही है।

व्यावसायिक

  • जब किसी लॉन्च के परिणाम के बाद पूरी टीम सामूहिक रूप से गहरी शर्म या गर्व महसूस करे, तो भावना की तीव्रता को इस बात से अलग करके देखें कि वह भावना टीम की क्षमता के बारे में वास्तव में क्या दावा कर रही है — परिणामों को लेकर प्रबल भावनाएँ अक्सर कार्य-कारण के बारे में उलझन को दर्शाती हैं, उसका कोई भरोसेमंद संकेत नहीं होतीं।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई करीबी किसी ऐसी बात के अपराध-बोध में डूबा हो जो काफ़ी हद तक उसके वश में नहीं थी, तो उसे यह देखने में मदद करें कि भावना का ज़ोर उस कहानी को सिद्ध नहीं करता जो वह सुना रही है — भावना की तीव्रता और भावना के दावे का सही होना, दो अलग बातें हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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