संस्कृत
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥
sparśān kṛtvā bahir bāhyāṃś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau
अनुवाद
बाहरी विषयों के स्पर्शों को बाहर ही रोककर, दृष्टि को भौंहों के बीच स्थिर करके, और नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान को सम करके।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह गीता का पहला ठोस ध्यान-निर्देश है, और यह दर्शन से अधिक किसी तकनीकी पुस्तिका की तरह पढ़ा जाता है: बाहरी स्पर्शों को बाहर रखा जाता है, दृष्टि भौंहों के बीच के बिंदु पर टिकाई जाती है, और प्राण और अपान, यानी बाहर जाने वाली और भीतर आने वाली श्वासें, सोच-समझकर सम की जाती हैं। यहाँ प्राणायाम का वर्णन है, पर अभी उसका नाम नहीं लिया गया है। यह उस स्थान से तीन श्लोक पहले है जहाँ अध्याय 6 इसी क्षेत्र का अपना, कहीं अधिक विस्तृत विवेचन आरम्भ करता है। इस श्लोक को अपने आप में एक पूरी विधि के बजाय अध्याय 6 की पूर्व-झलक के रूप में पढ़ना सबसे अच्छा है, क्योंकि यह आसन, अवधि या अभ्यास के स्थान को बताने से पहले ही रुक जाता है। यहाँ की सामग्री को गीता 6.10–गीता 6.14 में फिर से उठाया और विस्तार दिया गया है: इन्द्रियों को समेटना, स्थिर दृष्टि, सम श्वास। अध्याय 5 विधि की रूपरेखा देता है; अध्याय 6 आसन, स्थान और अति से बचने की चेतावनी जोड़ता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sparśān kṛtvā bahir bāhyāṃśस्पर्शान् कृत्वा बहिः बाह्यांश्
- बाहरी विषय-स्पर्शों को बाहर करके (sparśān + kṛtvā + bahiḥ + bāhyān)
- cakṣuś caivāntare bhruvoḥचक्षुश् चैवान्तरे भ्रुवोः
- और दृष्टि को भौंहों के बीच [स्थिर करके] (cakṣuḥ + ca + eva + antare + bhruvoḥ)
- prāṇāpānau samau kṛtvāप्राणापानौ समौ कृत्वा
- प्राण और अपान को सम करके (prāṇa-apānau + samau + kṛtvā)
- nāsābhyantaracāriṇauनासाभ्यन्तरचारिणौ
- नासिका के भीतर चलने वाले (nāsā-abhyantara-cāriṇau)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
There’s no transitional sentence here — the chapter simply drops, without announcement, from twenty-six verses of philosophical argument into pure technical instruction: gaze fixed, breath equalized. That abruptness is itself informative. The text seems to trust that once the philosophical case for inward-directed happiness has actually landed (verses 21-24), the natural next question is entirely practical — how, mechanically, is it done — and it answers without pausing to justify the change of register.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपको सचमुच यह विश्वास हो जाए कि कोई अभ्यास क्यों महत्त्वपूर्ण है, तो और कारण खोजते हुए वहीं न अटके रहें — सीधे उसकी व्यावहारिक विधि पर आ जाएँ; यह श्लोक जिस तरह अचानक तर्क से निर्देश पर आ जाता है, वह अक्सर ठीक वही सही कदम होता है, जब 'क्यों' सचमुच मन में बैठ चुका हो।
व्यावसायिक
- जब आपकी टीम किसी प्रक्रिया में बदलाव के पीछे के तर्क से सहमत हो जाए, तो 'क्यों' को और अधिक समझाने के लोभ से बचें — तुरंत इस ठोस व्यावहारिक पहलू पर आ जाएँ कि वह असल में कैसे किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक बिना किसी संक्रमण के सीधे तर्क से विधि पर आ जाता है।
परिवार और समाज
- जिस व्यक्ति का आप मार्गदर्शन कर रहे हैं, जब वह सचमुच समझ जाए कि कोई बात क्यों महत्त्वपूर्ण है, तो तर्क को बार-बार समझाना बंद करें और उसे ठीक-ठीक दिखाएँ कि वह कैसे किया जाता है — जब 'क्यों' मन में बैठ ही चुका हो, तब भी उसी को खींचते रहना आम तौर पर बस काम के हिस्से को टालता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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