संस्कृत
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
yatendriyamanobuddhir munir mokṣaparāyaṇaḥ vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ
अनुवाद
जिस मुनि ने इन्द्रिय-मनस्-बुद्धि को वश में कर लिया है, मोक्ष ही जिसका परम लक्ष्य है और जिसकी इच्छा, भय और क्रोध दूर हो चुके हैं, वह सदा मुक्त ही है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक पिछले श्लोक की ध्यान-मुद्रा को उसके आंतरिक पूरक के साथ पूरा करता है: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि एक साथ संयमित हैं — यह वही त्रयी है जिसका प्रयोग अध्याय पहले भी, श्लोक 11 में, कर चुका है — और मुनि एकनिष्ठ होकर मोक्ष की ओर उन्मुख है। यहाँ ध्यान देने योग्य विशेष त्रयी है इच्छा, भय और क्रोध, जिन तीनों के एक साथ चले जाने की बात कही गई है। अध्याय की अधिक परिचित जोड़ी — इच्छा और क्रोध — के साथ भय का आना यह संकेत देता है कि उसे उन्हीं का स्वाभाविक उपोत्पाद माना जा रहा है: उस मन की बेचैनी जिसका लगाव अब भी परिणामों में है, चाहे वे चाहे गए हों या उनसे डर हो। अंतिम कथन — वह निश्चय ही सदा मुक्त है — वर्तमान काल में कहा गया है, भविष्य के किसी पुरस्कार के रूप में सामने नहीं रखा गया। सदा मुक्त एव — “पहले से ही, सदा मुक्त” — मोक्ष को उस व्यक्ति के लिए एक वर्तमान तथ्य बना देता है जिसकी शक्तियाँ समेट ली गई हैं और जिसके इच्छा-भय-क्रोध चले गए हैं; यह मृत्यु के बाद होने वाला कोई निपटारा नहीं है। भय को इच्छा और क्रोध के साथ उसी लगाव के रूप में रखा गया है, जिसे उसके चिंतित पक्ष से देखा गया हो।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yatendriyamanobuddhirयतेन्द्रियमनोबुद्धिः
- जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि वश में हैं (yata-indriya-manaḥ-buddhiḥ)
- munirमुनिः
- मुनि
- mokṣaparāyaṇaḥमोक्षपरायणः
- मोक्ष में तत्पर (mokṣa-parāyaṇaḥ)
- vigatecchābhayakrodhoविगतेच्छाभयक्रोधो
- इच्छा, भय और क्रोध से रहित (vigata-icchā-bhaya-krodhaḥ)
- yaḥ sadā mukta eva saḥयः सदा मुक्त एव सः
- जो ऐसा है, वह सदा मुक्त ही है (yaḥ + sadā + muktaḥ + eva + saḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Read alongside verse 27, this verse completes a deliberate sequence: the previous verse addresses the outer, physical apparatus — gaze, breath — and this one turns to the inner instruments, senses, mind, intellect. The order isn’t arbitrary; the body is stabilized first, and only then does the text turn to the harder work of stabilizing what’s happening inside it, treating physical readiness as necessary staging ground rather than an optional preliminary.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी कठिन काम के लिए अपने मन को स्थिर करने का प्रयास कर रहे हों — कोई कठिन बातचीत, कोई बड़ा निर्णय — तो सीधे अपने विचारों को सँभालने पर न कूदें; पहले अपने शरीर और श्वास को शांत करें, ठीक वैसे ही जैसे श्लोकों की यह जोड़ी भीतरी तंत्र को सँभालने से पहले बाहरी तंत्र को स्थिर करती है।
व्यावसायिक
- किसी महत्त्वपूर्ण बैठक या प्रस्तुति से पहले शारीरिक तैयारी — मुद्रा, श्वास, शांत वातावरण — को वास्तविक तैयारी मानें, न कि कोई आरंभिक औपचारिकता जिसे मानसिक तैयारी की ओर बढ़ते हुए छोड़ दिया जाए; पहले बाहरी परिस्थितियों को ठीक कर लेने से भीतरी काम प्रायः आसान हो जाता है।
परिवार और समाज
- किसी प्रियजन के साथ कठिन बातचीत से पहले, आप क्या कहेंगे इसे सँभालने का प्रयास करने से पहले, एक क्षण रुककर स्वयं को शारीरिक रूप से शांत करें — श्वास, मुद्रा, थोड़ी-सी चुप्पी; पहले शरीर को स्थिर करने से मन को स्थिर करना अक्सर कहीं अधिक आसान हो जाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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