5.1

संस्कृत

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥

saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punar yogaṃ ca śaṃsasi yac chreya etayor ekaṃ tan me brūhi suniścitam

अनुवाद

अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर योग की भी। इन दोनों में से जो एक श्रेष्ठ हो, वह मुझे निश्चित रूप से बताइए।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अर्जुन अध्याय की शुरुआत एक प्रतीत होने वाली असंगति की ओर संकेत करके करते हैं: पिछले दो अध्यायों में कृष्ण ने कर्म के त्याग की भी प्रशंसा की है और योग में कर्म करने की भी, और अर्जुन दो परस्पर खिंचे हुए मार्गों के बजाय एक स्पष्ट उत्तर चाहते हैं। निश्चित उत्तर की उनकी माँग तीखी है — वे कृष्ण से इस खिंचाव को सुलझाने के लिए कह रहे हैं, उसे दोहराने के लिए नहीं। अध्याय के शेष भाग में कृष्ण का उत्तर वास्तव में दोनों काम करेगा: एक को श्रेष्ठ बताएगा (श्लोक 2) और फिर यह दिखाकर प्रतीत होने वाले विरोध को मिटा देगा कि जो किसी एक को भी ठीक से समझता है, उसके लिए दोनों वास्तव में एक ही हैं (श्लोक 4-5)। यह वही “मुझे एक बात बताइए” वाली माँग है जो गीता 3.2 में है, और इसे संरचना की दृष्टि से वही उत्तर मिलता है: एक भेद, जो अंत में एक ही बिंदु पर आ मिलता है। गीता 4.41 पहले ही योगसंन्यस्तकर्माणम् और ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् को एक ही व्यक्ति में जोड़ चुका है; अध्याय 5 उसी समास की व्याख्या है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇaसंन्यासं कर्मणां कृष्ण
हे कृष्ण, कर्मों का संन्यास (saṃnyāsam + karmaṇām)
punar yogaṃ ca śaṃsasiपुनः योगं च शंससि
और फिर आप योग की प्रशंसा करते हैं (punaḥ + yogam + ca + śaṃsasi)
yac chreya etayor ekaṃयच् छ्रेय एतयोः एकं
इन दोनों में से जो एक श्रेष्ठ है (yat + śreyaḥ + etayoḥ + ekam)
tan me brūhi suniścitamतन् मे ब्रूहि सुनिश्चितं
वह मुझे निश्चित रूप से बताइए (tat + me + brūhi + su-niścitam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Arjuna doesn’t ask “which is right” in the abstract — he demands one conclusive answer to a binary he has set up himself, renunciation or yoga. Krishna’s actual response across the rest of the chapter never honors that binary; instead of picking a side, it spends the next several verses dissolving the very opposition Arjuna insisted on. The chapter’s real answer isn’t the verdict Arjuna asked for — it’s a demonstration that his question was built on a false either/or.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Arjuna doesn’t only ask which path is better — “suniścitam,” conclusively, asks for the uncertainty itself to end. That urgency is diagnostic: a mind under real pressure often mistakes “give me one fixed answer” for “help me think clearly,” when the two aren’t the same request. Krishna’s refusal to simply pick a side isn’t evasion; it declines to feed a need for certainty that was never actually what would resolve Arjuna’s confusion.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी निर्णय को अपने सामने सख़्ती से 'या तो यह या वह' के रूप में रखते हैं, तो किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय इस संभावना के लिए खुले रहें कि ईमानदार उत्तर इस ढाँचे को ही मिटा दे — कभी-कभी थोपे गए चुनाव का सबसे उपयोगी जवाब यह पूछना होता है कि इसे चुनाव बनना ही क्यों था।

व्यावसायिक

  • जब कोई हितधारक आप पर निर्णायक दिखने का दबाव डालते हुए विकल्प A या विकल्प B में से एक चुनने की माँग करे, तो सोचिए कि क्या ईमानदार उत्तर इसके बजाय प्रश्न को ही नए ढंग से रखता है — यह दिखाना कि दोनों तरीक़े उसी परिणाम पर पहुँचते हैं जिसकी उन्हें वास्तव में परवाह है, किसी एक को विजेता घोषित करने से अधिक उपयोगी हो सकता है।

परिवार और समाज

  • जब कोई आपसे किसी एक पक्ष को चुनकर बहस निपटाने की माँग करे, तो देखें कि क्या विजेता घोषित करने के बजाय असहमति की शर्तों पर ही प्रश्न उठाना अधिक ईमानदार क़दम है — कभी-कभी दोनों पक्ष उससे कहीं अधिक सही होते हैं जितना यह ढाँचा मानता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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