5.25

संस्कृत

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

labhante brahmanirvāṇam ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ

अनुवाद

जिनके पाप क्षीण हो गए हैं, जिनका द्वैत कट चुका है, जिन्होंने स्वयं को संयम में रखा है और जो सब प्राणियों के हित में रत रहते हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

इस प्राप्ति से पहले तीन योग्यताएँ आती हैं, और ये एक साथ नहीं बल्कि एक के बाद एक आती प्रतीत होती हैं — पापों का क्षीण हो जाना, द्वैत का कट जाना (अर्थात् विपरीत जोड़ों में देखने की आदत: सुखद और अप्रिय, मेरा और मेरा नहीं), और मन का संयम — और इनके बाद अंत में आता है सभी प्राणियों के हित में आनंद। इस अंतिम वाक्यांश पर ठहरकर सोचना चाहिए: यहाँ मुक्ति कोई निजी, अपने में सिमटी हुई अवस्था नहीं है। उसके साथ दूसरे प्राणियों की भलाई की ओर एक सक्रिय झुकाव भी जुड़ा होता है, और यही बात चुपचाप अध्याय के अंत की उस पहचान की भूमिका बनाती है, जहाँ स्वयं कृष्ण को सभी प्राणियों का मित्र बताया गया है। सर्वभूतहिते रताः — “सभी प्राणियों के हित में आनंद लेने वाले” — यह वाक्यांश मोक्ष को लोकसंग्रह से जोड़ता है: मुक्त व्यक्ति दुनिया से हटकर नहीं बैठता, बल्कि दूसरों के कल्याण की ओर मुड़ा रहता है, ठीक वैसे ही जैसी अपेक्षा आगे गीता 12.4 भक्त से करेगा।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

labhante brahmanirvāṇamलभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं
ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं (labhante + brahma-nirvāṇam)
ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥऋषयः क्षीणकल्मषाः
जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, वे ऋषि (ṛṣayaḥ + kṣīṇa-kalmaṣāḥ)
chinnadvaidhā yatātmānaḥछिन्नद्वैधा यतात्मानः
जिनका द्वैत कट गया है, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है (chinna-dvaidhāḥ + yata-ātmānaḥ)
sarvabhūtahite ratāḥसर्वभूतहिते रताः
सभी प्राणियों के हित में लगे हुए (sarva-bhūta-hite + ratāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The outward-facing item — delight in the welfare of all beings — comes last in this verse’s sequence, after sins are worn away, duality severed, and the self restrained. That ordering matters: concern for others’ welfare isn’t presented as a starting discipline or a substitute for the inner work, it’s what shows up once the inner work is substantially done — an outcome of realization rather than a technique for reaching it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • "दूसरों की मदद पर ध्यान देने" को अपने भीतरी काम से बच निकलने का छोटा रास्ता न समझें — यह श्लोक दूसरों के कल्याण की सच्ची चिंता को गहरी भीतरी सफ़ाई के बाद रखता है, उसके स्वाभाविक परिणाम के रूप में, न कि उस सफ़ाई को स्वयं करने से कतराने के उपाय के रूप में।

व्यावसायिक

  • जब आपकी टीम का कोई व्यक्ति "मिशन" के प्रति चिंता का प्रदर्शन करे, जबकि उसकी अपनी प्रतिक्रियाशीलता और अहंकार साफ़ तौर पर अनसुलझे हों, तो इस असंगति पर ध्यान दें — बाहर की ओर सच्ची चिंता प्रायः वास्तविक भीतरी स्थिरता से ही उपजती है, वह उसका विकल्प नहीं होती।

परिवार और समाज

  • यदि आप पाएँ कि आप स्वयं अशांत और प्रतिक्रियाशील रहते हुए परिवार के साथ उदार और दूसरों पर केंद्रित होने का प्रयास कर रहे हैं, तो पहले अपना कुछ भीतरी काम करने पर विचार करें — यहाँ दूसरों की टिकाऊ देखभाल भीतरी स्थिरता के बाद आती है, उससे पहले नहीं आती और न ही उसकी जगह लेती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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