संस्कृत
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣan nimiṣann api indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan
अनुवाद
बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी वह यही धारणा रखता है कि इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्त हो रही हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 8 में शुरू हुई साधारण कर्मों की सूची को यह श्लोक चार और कर्म जोड़कर पूरा करता है, और फिर “मैं कुछ नहीं करता” इस दृढ़ भाव के पीछे का तर्क देता है: अपने विषयों में इन्द्रियाँ बरतती हैं, आत्मा नहीं। यह वही विषयी-विषय का प्रतिरूप है जिस पर अध्याय का बाद का तत्त्वदर्शन (श्लोक 14-15) आगे बढ़ता है — क्रिया प्रकृति और उसके साधनों, अर्थात् इन्द्रियों, की है, जबकि साक्षी आत्मा अविचल रहता है। इति धारयन् — “यह [विचार] धारण करते हुए” — अकर्तापन को एक बार की अनुभूति नहीं, बल्कि निरंतर बनी रहने वाली पहचान बना देता है: इन्द्रियाँ विषयों से व्यवहार करती हैं, और साक्षी लगातार यह देखता रहता है कि ऐसा ही हो रहा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- pralapan visṛjan gṛhṇannप्रलपन् विसृजन् गृह्णन्न्
- बोलते, त्यागते, ग्रहण करते हुए (pralapan + visṛjan + gṛhṇan)
- unmiṣan nimiṣann apiउन्मिषन् निमिषन्न् अपि
- आँखें खोलते और मूँदते हुए भी (unmiṣan + nimiṣan + api)
- indriyāṇīndriyārtheṣuइन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु
- इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में (indriyāṇi + indriya-artheṣu)
- vartanta iti dhārayanवर्तन्त इति धारयन्
- 'बरत रही हैं' — ऐसा समझते हुए (vartante + iti + dhārayan)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verb dhārayan — holding, maintaining as a sustained conviction — is doing careful work: the text doesn’t simply assert that the senses move among their objects while the self stays still, it specifies that the practitioner actively holds this understanding. That distinction matters. This isn’t a fact learned once and then coasted on; it’s a view actively re-affirmed against the more natural-feeling sense that “I” am the one seeing, speaking, grasping.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपने बारे में कोई अंतर्दृष्टि स्पष्टता के एक क्षण के बाद शायद ही कभी स्थायी रूप से टिकी रहती है — आपको उसे सक्रिय रूप से बार-बार थामे रखना पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक किसी अधिक स्वचालित, पुराने दृष्टिकोण के खिंचाव के विरुद्ध एक दृष्टिकोण को सोच-समझकर बनाए रखने का वर्णन करता है।
व्यावसायिक
- जब आपने किसी पिछली विफलता से कोई कठिन सबक सीखा हो — प्रतिक्रिया को व्यक्तिगत रूप से न लें, किसी एक आँकड़े को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व न दें — तो उसे एक ऐसे दृष्टिकोण की तरह लें जिसे आप हर नई परिस्थिति में सक्रिय रूप से फिर से थामते हैं, न कि ऐसे तथ्य की तरह जो अब अपने-आप आपकी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
परिवार और समाज
- किसी रिश्ते के बारे में बड़ी मुश्किल से पाई गई समझ — उनकी आलोचना वास्तव में मेरे बारे में नहीं है — को उसी क्षण सक्रिय रूप से फिर से थामना पड़ता है जब उसकी परीक्षा होती है, न कि केवल ऐसी चीज़ के रूप में याद रखना जिसे आपने कभी समझ लिया था और एक तरफ़ रख दिया था।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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