संस्कृत
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥
sarvakarmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṃ vaśī navadvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan
अनुवाद
जिसने स्वयं को वश में कर लिया है, वह देहधारी मन से सभी कर्मों का संन्यास करके नौ द्वारों वाले नगर में सुखपूर्वक रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न किसी से कुछ करवाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
नव-द्वार पुर, अर्थात् नौ द्वारों वाला नगर, स्वयं शरीर है — दो आँखें, दो कान, दो नासिका-छिद्र, मुख, और मल-मूत्र त्याग की दो इन्द्रियाँ — और यह बिंब देहधारण को एक भवन-रचना के रूप में नए ढंग से प्रस्तुत करता है: एक किलेबंद निवास, जिसमें आत्मा बंदी नहीं, बल्कि संप्रभु निवासी (वशी) है। सभी कर्मों का मन से संन्यास ही यहाँ निर्णायक वाक्यांश है — शारीरिक निष्क्रियता नहीं, बल्कि तादात्म्य में बदलाव: देही, अर्थात् देहधारी आत्मा, यह पहचान लेती है कि वह न कर्म करती है, न कर्म करवाती है, क्योंकि ये दोनों उपकरण के हैं, भीतर रहने वाले के नहीं। यह कथन उस भेद का पूर्वाभास देता है जो अगले दो श्लोकों में किया गया है, जहाँ आत्मा की स्थिरता और प्रकृति की क्रियाशीलता को दृढ़ता से अलग रखा गया है। वशी — “जो नियंत्रण में रखता है”, अर्थात् संप्रभु — को शरीर में फँसे होने की सामान्य धारणा के सामने रखा गया है: देही अधिकार-संपन्न निवासी है, कैदी नहीं। श्लोक 14–15 इसे तत्त्वमीमांसीय आधार देते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sarvakarmāṇi manasāसर्वकर्माणि मनसा
- सभी कर्मों को, मन से (sarva-karmāṇi + manasā)
- sannyasyāste sukhaṃ vaśīसंन्यस्यास्ते सुखं वशी
- त्यागकर, संयमी सुखपूर्वक रहता है (sannyasya + āste + sukham + vaśī)
- navadvāre pure dehīनवद्वारे पुरे देही
- देहधारी, नौ द्वारों वाले नगर में (nava-dvāre + pure + dehī)
- naiva kurvan na kārayanनैव कुर्वन् न कारयन्
- न कुछ करता हुआ, न करवाता हुआ (na + eva + kurvan + na + kārayan)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
It would have been easy for this verse to reach for the well-worn image of the body as a prison the self is trapped in — many traditions do. Instead it calls the body a city and names the indwelling self vaśī, sovereign, its ruling resident rather than its captive. The difference in framing matters: a prisoner’s discipline is about enduring confinement, while a sovereign’s discipline is about right rule over a domain that’s actually theirs to govern.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
The verse closes on a precise double negative — naiva kurvan na kārayan, neither doing nor causing to be done — which forecloses two separate escape routes at once: acting directly, and acting through delegation while claiming distance from the result. That second clause is easy to skip past, but it denies that arranging for something to happen counts as not-doing just because your own hands stayed clean. The indwelling self’s stillness isn’t a technicality achieved by outsourcing the action.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि आप अपने शरीर या अपनी परिस्थितियों को एक ऐसा पिंजरा मानते हैं जिसमें आप फँसे हुए हैं, तो उन्हें एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखने का प्रयास करें जिस पर वास्तव में आपका शासन है — 'मैं यहाँ का स्वामी हूँ' इस भाव से जो अनुशासन निकलता है, वह 'मैं यहाँ फँसा हुआ हूँ' इस भाव से निकलने वाले अनुशासन से बिल्कुल अलग दिखता है।
व्यावसायिक
- जब आपको कोई उलझी हुई व्यवस्था या टीम विरासत में मिले जिसे आपने नहीं चुना था, तो स्वयं को उसका बंदी मानने से बचें — उसे, जैसी भी अपूर्ण वह हो, ऐसे क्षेत्र के रूप में लेना जिस पर अब आपका शासन है, ऐसे कदमों का रास्ता खोलता है जो केवल उसे सहते रहने से कभी नहीं खुलेगा।
परिवार और समाज
- यदि कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी आपको क़ैद जैसी लगती है, तो देखें कि उसे ऐसी चीज़ के रूप में देखना जिस पर आपका शासन है, न कि ऐसी चीज़ जिसके भीतर आप फँसे हैं, क्या इस बात को बदल देता है कि आप उसके बारे में क्या करने को तैयार हैं — स्वामित्व और बंदीपन बहुत अलग-अलग प्रकार के कर्म की माँग करते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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