5.21

संस्कृत

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥

bāhyasparśeṣv asaktātmā vindaty ātmani yat sukham sa brahmayogayuktātmā sukham akṣayam aśnute

अनुवाद

जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं है, वह आत्मा में जो सुख है, उसे पा लेता है। ब्रह्म के साथ योग से युक्त होकर वह अक्षय सुख का भोग करता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

बाहरी स्पर्शों से हटकर आत्मा के भीतर स्थित सुख की ओर यह मोड़ ही वह धुरी है, जिस पर शेष अध्याय टिका है — यहाँ से अंत तक सब कुछ ऐसे आनंद के बारे में है जो इस पर निर्भर नहीं करता कि इन्द्रियाँ किसे छूती हैं। अक्षय, अर्थात् अविनाशी, शब्द अगले श्लोक के तर्क के सामने एक सटीक काम कर रहा है: इन्द्रिय-सुख इसलिए क्षीण होते हैं क्योंकि वे संयुक्त घटनाएँ हैं जिनका आदि और अंत होता है, जबकि यह आंतरिक सुख आत्मा के ही स्वभाव का होने के कारण उस संरचना का कोई भी अंश साझा नहीं करता। यह अध्याय 6 के ध्यान-संबंधी निर्देशों का पहला स्पष्ट पूर्वसंकेत भी है, जो लगभग एक दर्जन श्लोकों में ठीक-ठीक बताएँगे कि मन को भीतर की ओर कैसे ले जाया जाता है ताकि वह इसी सुखम् को पा सके। अक्षय सुख — “ऐसा सुख जो घिसकर समाप्त नहीं होता” — को बिंदु-दर-बिंदु गीता 5.22 के आद्यन्तवत्, “जिसका आदि और अंत हो”, के विरोध में रखा गया है। आंतरिक आनंद का कोई किनारा नहीं है जहाँ से वह क्षीण हो, क्योंकि वह आत्मा का स्वभाव साझा करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

bāhyasparśeṣv asaktātmāबाह्यस्पर्शेष्व् असक्तात्मा
बाहरी विषय-स्पर्शों में अनासक्त चित्त वाला (bāhya-sparśeṣu + asakta-ātmā)
vindaty ātmani yat sukhamविन्दत्य् आत्मनि यत् सुखं
आत्मा में जो सुख है, उसे पाता है (vindati + ātmani + yat + sukham)
sa brahmayogayuktātmāस ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
वह ब्रह्म के योग से युक्त चित्त वाला (saḥ + brahma-yoga-yukta-ātmā)
sukham akṣayam aśnuteसुखं अक्षयं अश्नुते
अक्षय सुख भोगता है (sukham + akṣayam + aśnute)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The verse’s sequence is worth taking literally: unattachment from external contacts comes first, and finding joy within the self follows as a result, not alongside it as an unrelated parallel fact. Read this way it’s a causal claim, not just two nice things happening to the same person — the withdrawal has to happen before the inward joy becomes available, a stronger and more demanding claim than “detached people also happen to be happy.”

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • यदि आप हर उपलब्ध बाहरी मान्यता के पीछे भागते हुए भी सच्चे आंतरिक संतोष के अनुभव की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो इस श्लोक के क्रम पर ध्यान दें — बाहरी निर्भरता से हटना आंतरिक शांति का कोई गौण परिणाम नहीं है, बल्कि उसकी पूर्व शर्त है।

व्यावसायिक

  • यदि आप अपने काम में लगातार बाहरी सराहना पर निर्भर रहने के बजाय भीतर से संतोष चाहते हैं, तो इस निर्भरता को कम करने को पहला कदम मानें, न कि ऐसी चीज़ जो संतुष्ट हो जाने के बाद अपने-आप हो जाएगी — क्रम मायने रखता है।

परिवार और समाज

  • यदि आप चाहते हैं कि आपके आत्म-मूल्य का भाव इस बात के साथ डगमगाना बंद हो जाए कि कोई संबंध दिन-प्रतिदिन कैसा चल रहा है, तो पहले उसी विशेष निर्भरता को कम करने पर काम करें — जब तक निर्भरता पूरी तरह बनी रहती है, स्थिरता शायद ही कभी अपने-आप आती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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