5.20

संस्कृत

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥

na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijet prāpya cāpriyam sthirabuddhir asammūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ

अनुवाद

जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो मोह से मुक्त है, ऐसा ब्रह्म को जानने वाला और ब्रह्म में स्थित पुरुष प्रिय को पाकर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह लगभग अध्याय 2 के स्थितप्रज्ञ-वर्णन की सीधी प्रतिध्वनि है — सुख या दुःख से अविचलित — पर यहाँ इसे अमूर्त रूप में आदर्श संन्यासी के चित्र के बजाय ब्रह्मविद्, अर्थात् ब्रह्म को जानने वाले, की मनोवैज्ञानिक पहचान के रूप में रखा गया है। स्थिरबुद्धि, यानी दृढ़ बुद्धि, और असम्मूढ़, यानी जो मोहित न हो, एक ही स्थिरता को दो कोणों से नाम देते हैं: एक संरचनात्मक — वह क्षमता डगमगाती ही नहीं; और एक अनुभवात्मक — भ्रम उठता ही नहीं। यह अध्याय अलग-अलग प्रवेश-बिंदुओं से बार-बार इसी भाव पर लौटता है — कर्म, दूसरे प्राणियों को देखने का ढंग, और अब अपने भाग्य के प्रति प्रतिक्रिया — मानो परख रहा हो कि यह हर प्रकार के दबाव में टिकी रहती है या नहीं। गीता 2.57 के “न हर्षित होता है, न पीछे हटता है” से इसका मेल लगभग शब्दशः है; यहाँ जो जुड़ा है वह है पहचान — यह स्थिरता ब्रह्मविद् होना ही है, केवल उसका एक लक्षण नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na prahṛṣyet priyaṃ prāpyaन प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य
प्रिय को पाकर हर्षित न हो (na + prahṛṣyet + priyam + prāpya)
nodvijet prāpya cāpriyamनोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियं
और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो (na + udvijet + prāpya + ca + apriyam)
sthirabuddhir asammūḍhoस्थिरबुद्धिः असंमूढो
स्थिर बुद्धि वाला, मोह से रहित (sthira-buddhiḥ + asammūḍhaḥ)
brahmavid brahmaṇi sthitaḥब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः
ब्रह्म को जानने वाला, ब्रह्म में स्थित (brahma-vit + brahmaṇi + sthitaḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The verse’s word order puts the behavior before the label: it describes someone who doesn’t rejoice at the pleasant and doesn’t recoil from the unpleasant, and only after that behavior is fully specified does it attach the title brahma-vid, knower of Brahman. That ordering is a quiet claim about what the title actually certifies — not a credential held independent of conduct, but a name earned by, and visible only through, the behavior described first.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी उपाधि के पीछे न भागें — प्रबुद्ध, अनुशासित, परिपक्व — मानो वह आचरण से अलग से मिलने वाली कोई चीज़ हो; यह श्लोक पहले आचरण का नाम लेता है और उपाधि बाद में देता है, उसके वर्णन के रूप में जो पहले से सच था, न कि ऐसी हैसियत के रूप में जिसे पहले पाना हो और फिर उसके आधार पर काम करना हो।

व्यावसायिक

  • किसी पदनाम — सीनियर, प्रिंसिपल — को वह चीज़ न बनने दें जिसका आप प्रदर्शन कर रहे हों; पदनाम का काम उस आचरण का वर्णन करना है जो पहले से मौजूद है, और जिस आचरण का वह नाम है उससे पहले ही उस लेबल के पीछे भागने से अक्सर काम ठीक उल्टे क्रम में होने लगते हैं।

परिवार और समाज

  • यदि आप चाहते हैं कि आपके परिवार में आपको शांत और भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में देखा जाए, तो पहले वास्तविक आचरण विकसित करें, बजाय इसके कि आप वह पहचान अपना लें और आशा करें कि आचरण अपने आप आ जाएगा — नाम का काम उसका वर्णन करना है जो पहले से सच है, उसकी जगह लेना नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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