संस्कृत
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ
अनुवाद
जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं, इसी जीवन में, संसार को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
इहैव, “यहीं”, यानी इसी जीवन में — यह बात मायने रखती है। दावा यह नहीं है कि समत्व आगे चलकर कोई फल दिलाता है। दावा यह है कि देह में रहते हुए, अभी ही, समत्व स्वयं भव-चक्र पर विजय है। तर्क लगभग न्यायवाक्य जैसा है — ब्रह्म निर्दोष, यानी दोषरहित, और सम, यानी समान है। इसलिए जो मन साम्य, यानी समानता, में स्थित है, वह इसी कारण पहले से ब्रह्म में स्थित है। समत्व ब्रह्म की ओर ले जाने वाला कोई गुण नहीं है, बल्कि ब्रह्म में स्थित होना भीतर से ऐसा ही दिखता है। अध्याय 2 में स्थितप्रज्ञ का चित्रण किया गया था। उसके बाद यही श्लोक और इससे पहले वाला श्लोक मिलकर सबसे विस्तार से बताते हैं कि स्थिर प्रज्ञा वास्तव में देखने-समझने के ढंग को कैसे बदल देती है। इन दोनों अंशों को साथ-साथ पढ़ना सार्थक है। यह न्यायवाक्य बिल्कुल सटीक है: ब्रह्म सम है, इसलिए साम्य में स्थिर मन पहले से ही ब्रह्म में है। इसी कारण गीता समत्व को लक्ष्य की ओर बढ़ने वाली एक सीढ़ी नहीं, बल्कि लक्ष्य का भीतरी रूप मानती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- ihaiva tair jitaḥ sargoइहैव तैः जितः सर्गो
- यहीं उन्होंने संसार को जीत लिया है (iha + eva + taiḥ + jitaḥ + sargaḥ)
- yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥयेषां सांये स्थितं मनः
- जिनका मन समता में स्थित है (yeṣām + sāmye + sthitam + manaḥ)
- nirdoṣaṃ hi samaṃ brahmaनिर्दोषं हि समं ब्रह्म
- क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है (nirdoṣam + hi + samam + brahma)
- tasmād brahmaṇi te sthitāḥतस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः
- इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं (tasmāt + brahmaṇi + te + sthitāḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Ihaiva — right here, in this very life — is doing real work against a reader’s expectation, since a text this concerned elsewhere with rebirth and future states might be expected to locate victory over saṃsāra somewhere ahead. Instead the verb is past tense, jitaḥ, already conquered, not going to be conquered. The claim is that equanimity doesn’t earn a future reward; it constitutes the victory the moment it’s actually present, with nothing left to wait for.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- आंतरिक शांति को ऐसा पुरस्कार मानना छोड़ दीजिए जो आपको बाद में, पर्याप्त अनुशासन या उपलब्धि के बाद मिलेगा — इस श्लोक का दावा यह है कि शांति स्वयं, जब भी वह सचमुच मौजूद होती है, अपने आप में ही जीत है, किसी ऐसी जीत की अग्रिम किस्त नहीं जो कभी आगे चलकर आएगी।
व्यावसायिक
- जब आपकी टीम किसी भविष्य की स्थिति के पीछे भाग रही हो — इस लॉन्च के बाद सब शांत हो जाएगा — तो देखिए कि जो शांति आप वास्तव में चाहते हैं, क्या वह अभी आपके काम करने के ढंग में उपलब्ध है, न कि कोई ऐसी चीज़ जिसे हर बार अगले पड़ाव के बाद तक टाल दिया जाता है।
परिवार और समाज
- यदि आप ख़ुद से यही कहते रहते हैं कि चीज़ें ठीक हो जाने पर आप सचमुच अपने परिवार के साथ पूरी तरह उपस्थित रहेंगे, तो ध्यान दीजिए कि चीज़ों का ठीक होना प्रायः भविष्य की कोई ऐसी घटना नहीं होती जो आने की प्रतीक्षा में हो — जिस उपस्थिति को आप चाहते हैं, उसका अभ्यास अभी करना होगा, उसी में जो वास्तव में घट रहा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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