5.10

संस्कृत

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ lipyate na sa pāpena padmapatram ivāmbhasā

अनुवाद

जो अपने सभी कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

इस अध्याय की सबसे अधिक उद्धृत की जाने वाली छवि। कर्मों को अपना किया हुआ मानने के बजाय उन्हें ब्रह्म में अर्पित करना, और साथ ही आसक्ति का त्याग करना — यही योगी को कर्म से वैसे ही निर्लिप्त रखता है जैसे कमल का पत्ता उस जल से नहीं भीगता जिस पर वह तैरता है — पत्ते की सतह पानी को सोखने के बजाय उसे दूर हटा देती है, जो ऐसे कर्म के लिए एक सटीक छवि है जो कर्ता को छूता तो है, पर उसके भीतर समाता नहीं। यह वही अनुशासन है जिसे अध्याय 2 अपने “तुम्हारा सरोकार केवल कर्म से है” वाले सूत्र में कहता है, और यहाँ उसे उसका सबसे यादगार रूपक मिलता है। ब्रह्मण्याधाय कर्माणि — “कर्मों को ब्रह्म में रखकर” — गीता 4.24 में कर्म के हर अंग के ब्रह्म में विलीन हो जाने का पूर्वाभास देता है: यदि कर्म पहले ही वहाँ समर्पित है, तो कोई कर्ता बचता ही नहीं जिसे वह मलिन कर सके।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

brahmaṇy ādhāya karmāṇiब्रह्मण्य् आधाय कर्माणि
कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके (brahmaṇi + ādhāya + karmāṇi)
saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥसङ्गं त्यक्त्वा करोति यः
जो आसक्ति त्यागकर कर्म करता है (saṅgam + tyaktvā + karoti + yaḥ)
lipyate na sa pāpenaलिप्यते न स पापेन
वह पाप से लिप्त नहीं होता (lipyate + na + saḥ + pāpena)
padmapatram ivāmbhasāपद्मपत्रं इवांभसा
जैसे कमल का पत्ता जल से (padma-patram + iva + ambhasā)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

The lotus-leaf image is worth pushing on for its mechanism, not just its beauty: a lotus leaf doesn’t repel water by effort in the moment — its surface is simply built that way. Read literally, the simile suggests that placing action in Brahman and releasing attachment isn’t primarily a feat of willpower exercised each time action occurs, but a structural quality established once and then simply operative, the way the leaf isn’t straining against the water so much as never really meeting it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • अनासक्ति की ओर अपनी प्रगति को इस बात से न मापें कि आप उस क्षण में हर इच्छा से कितनी कड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं — सच्ची प्रगति कुछ ऐसी दिखती है कि वह खिंचाव आप पर असर ही नहीं डालता, जैसे कमल का पत्ता पानी से संघर्ष नहीं कर रहा होता, बस वह उससे भीगता नहीं।

व्यावसायिक

  • जब काम पर आलोचना या असफलताओं से आप विचलित होना बंद कर दें, तो ध्यान दें कि यह दाँत भींचकर किया गया संयम है या सचमुच इस बात में बदलाव आया है कि बात आप तक कैसे पहुँचती है — दूसरा अधिक टिकाऊ होता है, और वह आमतौर पर उसी क्षण के प्रयास से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास से बनता है।

परिवार और समाज

  • यदि आप परिवार के किसी सदस्य की बातों को व्यक्तिगत रूप से लेना बंद करना चाहते हैं, तो हर बार दाँत भींचकर उसे सहने के बजाय इस बात में बदलाव का लक्ष्य रखें कि वह बात आप तक कैसे पहुँचती है — लक्ष्य है पानी का पत्ते से लुढ़क जाना, न कि पत्ते का उससे जूझना।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    ← 5.9अध्याय 5 · 29 में से 105.11 →
    श्लोक पर जाएँ